यह दु:खद समाचार है कि भारत के महान वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना 09 नवम्बर, 2011 को नहीं रहे। इससे भी दु:खद बात यह है कि भारतीय मूल के इस नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक के निधन का समाचार इतनी देर से पता चल पाया। यह स्िथति अत्यंत खेदजनक है। इससे बहुत से सवाल हमारे सामने उठ खड़े हुए हैं।
'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएसन परिवार' डॉ0 हरगोविंद खुराना के निधन पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता है। इस अवसर पर प्रस्तुत है डॉ0 खुराना के जीवन एवं योगदान से परिचित कराता एक आलेख:
'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएसन परिवार' डॉ0 हरगोविंद खुराना के निधन पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि प्रस्तुत करता है। इस अवसर पर प्रस्तुत है डॉ0 खुराना के जीवन एवं योगदान से परिचित कराता एक आलेख:
डॉ0 हरगोविन्द खुराना
हरगोविंद खुराना का जन्म 09 जनवरी, 1922 में मुल्तान जिले के रायपुर नामक गाँव में हुआ था। वर्तमान में यह स्थान पाकिस्तान में है। वे अपने माता-पिता की पाँचवी संतान थे। उनके पिता लाला गणपतराय गाँव के पटवारी थे। वे जब 12 वर्ष के थे, तभी उनके पिता का निधन हो गया।
हरगोविंद की प्राथमिक शिक्षा गाँव के स्कूल में हुई। उन्होंने मिडिल की परीक्षा खालेवाल से दी, जिसमें उन्हें पूरे जिले में प्रथम स्थान प्राप्त हुआ। इससे उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। उसके बाद उन्होंने डी.ए.वी हाईस्कूल, मुल्तान में प्रवेश लिया। वे प्रारम्भ से मेधावी विद्यार्थी थे और अक्सर पढ़ाई में इतने मगन हो जाते थे कि भूख-प्यास तक बिसरा देते थे। हरगोविंद को बचपन से ही गणित में विशेष रूचि थे। वे माँ के खाना बनाते समय उनके पास बैठकर पढ़ाई करते और शर्त लगाते हुए कहते- माँ, देखता हूँ मेरा सवाल पहले हल होता है, या तुम्हारी रोटी पहले उतरती है। और इस शर्त में अक्सर वे ही सफल होते।
जब हाईस्कूल का रिजल्ट निकला, उनका मेरिट सूची में शामिल था। उसे देखकर वे जोर-जोर से रोने लगे। यह देखकर सभी बच्चे आश्चर्यचकित रहे गये। किसी को उनके रोने का कारण समझ में नहीं आ रहा था। आखिर एक बच्चे ने राने का कारण पूछा- ‘गोविन्द (प्यार से उन्हें सभी लोग गाविन्द कहकर बुलाते थे), तुम रो क्यों रहे हो। तुम्हारा नाम तो मेरिट लिस्ट में आया है।’ यह सुनकर हरगोविंद ने सुबकते हुए जवाब दिया, ‘हाँ, पर मेरा नाम मेरिट लिस्ट में दूसरे स्थान पर है।’
हरगोविंद ने आगे की पढ़ाई डी.ए.वी. कॉलेज, लाहौर से ही की। वे सभी परीक्षाओं में प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण हुए। बी.एस-सी. करने के बाद उन्होंने रसायन विज्ञान से एम.एस-सी. की। यह परीक्षा भी उन्होंने प्रथम श्रेणी में पास की। आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें छात्रवृत्ति भी प्राप्त हुई। उन दिनों शोध कार्य के लिए भारत में अच्छी सुविधा उपलबध नहीं थी, इसलिए वे 1946 में इंग्लैण्ड चले गये।
हरगोविंद ने लिवरपूल विश्वविद्यालय में प्रवेश लिया। वहाँ पर उन्हें नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो. अलेक्जेंडर टॉड के साथ काम करने का मौका मिला। उन्होंने जैव रसायन के अन्तर्गत ‘न्यूक्लिओटाइड’ विषय में शोधकार्य किया। सन 1948 में उनका शोधकार्य पूरा हुआ। उसी दौरान उन्हें भारत सरकार से एक और छात्रवृत्ति मिली, जिससे वे आगे के अध्ययन के लिए स्विटजरलैण्ड चले गये। वहाँ पर उन्होंने प्रो. प्रिलॉग के साथ रहकर काम किया।
हरगोविंद अपनी पढाई पूरी करके अपने भाई के पास आ गये। उन्होंने दिल्ली बंगलौर सहित कई प्रयोगशालाओं में नौकरी के लिए प्रार्थना पत्र दिया, लेकिन संयोग से उनको मनचाही नौकरी नहीं मिल सकी। इससे हरगोविंद खिन्न हो गये और वापस इंग्लैण्ड चले गये।
डॉ. खुराना ने कैम्ब्रिज विश्विद्यालय में प्रो. टॉड की देखरेख में शोधकार्य किया। 1952 में उनके पास कोलम्बिया विश्विद्यालय से बुलावा आया। वे वहाँ चले गये और जैव रसायन विभाग के अध्यक्ष चुल लिये गये। वहाँ पर रहकर उन्होंने आनुवाँशिकी में शोध करने का निश्चय किया। धीरे-धीरे उनके शोध पत्र अन्तर्राष्ट्रीय शोध जर्नलों में प्रकाशित हुए। इससे वे काफी चर्चित हो गये और उन्हें अनेक पुरस्कार भी प्राप्त हुए।
सन 1960 में डॉ. खुराना अमेरिका चले गये। वहाँ पर वे विस्काँसिन विश्वविद्यालय के एंजाइम शोध संस्थान के सहायक निर्देशक नियुक्त हुए। आगे चलकर वे संस्थान के महानिदेश भी बने। डॉ. खुराना वर्ष 1952 में ही स्विटजरलैण्ड के एक संसद सदस्य की पुत्री से विवाह कर चुके थे। उनकी पत्नी एस्थर एक बहुत ही समझदार स्त्री थीं। अब तक वे दो पुत्रियों और एक पुत्र के पिता बन चुके थे। ऐसे में डॉ. खुराना का मन वहीं लग गया और उन्होंने सन 1966 में अमेरिका की नागरिकता ग्रहण कर ली।
डॉ. खुराना ने एंजाइम शोध संस्थान में रहते हुए जेनेटिक कोड पर शोध कार्य किया। उनके इस शोध में अमेरिकी वैज्ञानिक मार्शल निरेनबर्ग और डॉ. रॉबर्ट डब्लू. रैले ने सहयोग दिया। उनका यह शोध बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ, जिसपर उन्हें वर्ष 1968 का चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्राप्त हुआ।
डॉ. खुराना को उनके अनुंसधान कार्य के लिए जो सम्मान प्राप्त हुए, उनमें 1968 में मिला नोबेल पुरस्कार मुख्य है। उसके अतिरिक्त उन्हें सन 1958 में कनाडा का मर्क मैडल, सन 1960 में कनाडियन पब्लिक सर्विस का स्वर्ण पदक, सन 1967 में डैनी हैनमैन पुरस्कार, सन 1968 में लॉस्कर फेडरेशन पुरस्कार तथा लूसिया ग्रास हारी विट्ज पुरस्कार प्राप्त हुए। सन 1969 में डॉ. खुराना भारत आए। उस समय भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से अलंकृत किया। इसके अतिरिक्त उन्हें पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ ने डी.एस-सी. की मानद उपाधि भी प्राप्त हुई।
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नोट: यह लेख ज़ाकिर अली 'रजनीश' की प्रकाशनाधीन पुस्तक 'भारत के महान वैज्ञानिक' का एक संक्षिप्त अंश है। इसका किसी भी प्रकार का प्रयोग करने से पूर्व लेखक की अनुमति अनिवार्य है।
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24 प्रतिक्रियाएँ:
जाकिर अली जी,आपने डॉ खुराना के बारे में जो
अमूल्य जानकारी उपलब्ध कराई है उसके लिए
आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार.
डॉ. खुराना जी को विनम्र नमन व श्रद्धांजलि.
समय मिले तो मेरे ब्लॉग पर आईयेगा.
महान वैज्ञानिक डॉक्टर हरगोविंद खुराना जी को हम शत शत नमन और श्रद्धांजलि अर्पित करते है .
आज के समय में आपके जैसे वैज्ञानिको की कमी है.और ये भारतीय विज्ञान जगत के लिए महत्वपूर्ण क्षति है .
इस महान वैज्ञानिक को इस तरह बिसरा दिया जाना समाज में वैज्ञानिकों की दशा को दर्शाता है ...बहुत दुखद !
डा खुराना जी को हार्दिक श्रद्धांजली।
Deep condolences on the sad demise of Dr Hargobind Singh Khurana.
Entire nation salutes him, who made the country pride and served the humanity.
डॉ. खुराना जी को विनम्र नमन व श्रद्धांजलि|
Gyan Darpan
.
महान वैज्ञानिक डॉ0 हरगोविंद खुराना के निधन पर उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि. उनके जन्मदिन ९ जनवरी पर एक छोटा सा लेख मैंने भी दिया था,
जाकिर अली जी,
आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार.
आज के समय में डॉ खुराना जैसे वैज्ञानिको की कमी है.
ये भारतीय विज्ञान जगत के लिए bhi महत्वपूर्ण क्षति है .
हार्दिक श्रद्धांजलि!
आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।
शास्त्री जी, इस पोस्ट को चर्चा में शामिल करने के लिए आभार।
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नई दृष्टि, नई सोच से खाली है आज का बालसाहित्य।
कुछ महाभाटों ने किया बाल साहित्य का नुकसान: प्रकाश मनु।
डा. खुराना जी के बारे में अच्छी जानकारी
उन्हें
मेरी ओर से सच्ची श्रद्दांजलि
अनमोल जानकारी... बहुमूल्य पोस्ट...
खुराना जी सादर श्रद्धांजली
भारत से प्रतिभाओं का बाहर जाना और जीवन जगत से यूं अनाम कूच कर जाना कितना दुखद है .हरगोविंद जी का काम एक नींव का पत्थर है .
बहुमूल्य जानकारी के लिये,सादर धन्यवाद.
डा.खुराना के बारे में इतना कुछ आपके ब्लॉग क माध्यम से जाना ... खुराना जी को नम्र श्रधांजलि ....
congratulations Rajneesh ji,,,,
डा. खुराना जी के बारे में अच्छी जानकारी उपलब्ध कराई है रजनीश जी ने, बधाई
उन्हें
डा. खुराना को हम सब की ओर से श्रद्दांजलि.
बहुत ही उचित जानकारी!
उन्हें श्रद्धांजली!
नमन!
धन्यवाद इनके विषय में इस महत्वपूर्ण जानकारी के लिए. अपने बौद्धिक प्रतिनिधियों के प्रति ऐसी उपेक्षा दुखद है.
डा.खुराना के बारे में इतना कुछ आपके ब्लॉग क माध्यम से जाना ... खुराना जी को हार्दिक श्रद्धांजलि ....
आपने बहुत अच्छा लिखा है ! बधाई! आपको शुभकामनाएं !
आपका हमारे ब्लॉग http://tv100news4u.blogspot.com/ पर हार्दिक स्वागत है!
महान वैज्ञानिक डॉक्टर हरगोविंद खुराना जी को हम शत शत नमन और श्रद्धांजलि
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