विश्व विरासत ‘माचू-पिचू’ की खोज के 100 वर्ष



यूनेस्को द्वारा ‘विश्व विरासत स्थल’ के रूप में संरक्षित और 2007 में आयोजित एक ऑनलाइन सर्वेक्षण द्वारा ‘विश्व के सात नए आश्चर्य’ में एक माचू-पिचू अपनी पुनर्खोज के सौ वर्ष पूर्ण कर रहा है. 24 जूलाई, 1911 को स्थानीय निवासियों की सहायता से अमेरिकन इतिहासकार और याले विश्वविद्यालय में प्रवक्ता हिरम बिंघम ने समय के साथ खो से गए इस ऐतिहासिक नगर की पुनर्खोज की घोषणा की.

उरुबंबा नदी के तट पर स्थित माचू - पिचू प्राचीन इन्का सभ्यता से जुडा एक महत्वपूर्ण नगर है जो संभवतः इसकी राजधानी के रूप में विकसित किया जा रहा था. इस शहर को ‘इन्का सभ्यता का एक विलुप्त शहर’ (The Lost City of Inca) के रूप में भी याद किया जाता है.

माचू-पिचू का शाब्दिक अर्थ है ‘प्राचीन चोटी’ (Old Peak). लगभग 1400 AD में इन्का राजाओं द्वारा इसे अपनी राजधानी के रूप में विकसित किये जाने के प्रयास किये जा रहे थे, जो संभवतः किसी महामारी या स्पेनी अतिक्रमण के बाद परित्यक्त ही छोड़ दिया गया. यद्यपि स्थानीय लोग इस शहर के अस्तित्व से अवगत थे, मगर इस खो से चुके शहर को एक बार पुनः आधिकारिक रूप से दुनिया के सामने लाने में बिंघम की महत्वपूर्ण भूमिका रही.

यह शहर विशिष्ट इन्का शैली में निर्मित है, जो अपनी निर्माणकला में इंजीनियरिंग विशेषताओं के लिए विश्वप्रसिद्ध है. इस शहर की दीवारें विशिष्ट Ashlar शैली में निर्मित हैं जिसमें विभिन्न पाषाण खंडों को एक दूसरे के साथ बिना किसी सीमेंट सदृश्य पदार्थ के काफी खूबसूरती से इस कदर जोड़ा गया है कि कहते हैं दो शिलाओं के बीच घास का टुकड़ा तक नहीं रखा जा सकता.

पेरू भूगर्भीय हलचलों से प्रभावित होने वाला एक प्रमुख शहर है. ऐसे में बिना Mortar या सीमेंट के ये संरचनाएं ज्यादा भूकंप रोधी सिद्ध हुई हैं. भूकंप की स्थिति में ये पाषाण अपने स्थान से थोड़े विस्थापित हो स्वयं ही नई स्थिति के अनुकूल समायोजित हो जाने की अद्भुत विशिष्टता रखते हैं.


शहर मुख्यतः दो भागों में विभक्त है एक आवासीय क्षेत्र दूसरा कृषि क्षेत्र. कृषि क्षेत्र अपने अनूठे सीढ़ीदार (Terraces) बनावट के लिए प्रसिद्ध हैं. यह बनावट न सिर्फ कृषि भूमि की मात्र को बढाती थी बल्कि मिट्टी के कटाव से भी बचाती थी, साथ ही यह भू-स्खलन (Landslides) से भी संरक्षण करती थी. उन्होने अपनी एक सड़क व्यवस्था भी विकसित की थी, जो आज भी पर्यटकों द्वारा यहाँ तक पहुँचने में व्यवहृत की जा रही है. वास्तु और निर्माण कला में इंजीनियरिंग के प्रयोग का यह शहर एक अप्रतीम उदाहरण है.


यहाँ कई पाषाणभित्तियां भी प्राप्त हुई हैं. पुरातात्विक साक्ष्य इस शहर के दूरवर्ती क्षेत्रों से परस्पर संबंधों की भी पुष्टि करते हैं. 

यह शहर अपने प्राचीन खगोलिय ज्ञान के लिए भी प्रसिद्द है. यहाँ स्थित  'इन्तिहुआताना' (Intihuatana; Inti – Sun, Wata – To tie) नामक पाषाणीय संरचना तत्कालीन इन्का सभ्यता द्वारा खगोलिय घडी या कैलेण्डर के रूप में प्रयुक्त होती थी. यह संरचना Solstice तथा Equinox के अध्ययन में प्रयुक्त होती थी.


अपनी विरासत के संरक्षण के अलावे अतीत में उसके प्रति किये गए अन्याय को स्वीकार उसे सुधारने में भी दूसरे देश हमसे कहीं आगे हैं, जबकि हमारे यहाँ अपनी धरोहर के प्रति जागरूकता तथा लगाव का सर्वथा अभाव है.

इस स्थल के इतिहास को पुनर्जीवित करने के वैश्विक प्रयासों में एक स्पेनिश सांस्कृतिक केन्द्र द्वारा दिल्ली के कनाट प्लेस में आयोजित एक प्रदर्शनी भी है, जो 24 जून से 28 जुलाई तक जारी है.


उल्लेखनीय है कि माचू-पिचू की खूबसूरती को सिनेमेटिक नजरिये से रजनीकांत की Enthiran (हिंदी वर्सन रोबोट) के ‘किलिमंजारो’ गाने में भी फिल्माया गया है. 


अंत में एक आर्कियोलौजिकल पहेली :

इस तस्वीर के बारे में क्या ख्याल है आपका !



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10 प्रतिक्रियाएँ:

veerubhai said...

अभिषेक जी की अच्छी शोध परक प्रस्तुति हमें अपनी सांस्कृतिक और पुरातात्विक इतिहासिक धरोहर के बारे में आगाह करती हुई .आभार सांझा करने के लिए .

Zakir Ali Rajnish said...

पहली बार इतने विस्‍तार से जानने को मिला माचू पिचू के बारे में। इस ऐतिहासिक जानकारी को शेयर करने का शुक्रिया।

Arvind Mishra said...

जानकारी के लिए आभार

आशीष श्रीवास्तव said...

मुझे एक बार माचु पिच्चू जरूर जाना है!

डॉ0 अशोक कुमार शुक्ल said...

Thanks to share such a beautiful article.

अभिषेक मिश्र said...

@ आशीष जी,
आपकी माचु-पिचु यात्रा की प्रतिक्षा रहेगी ताकि वहाँ की और प्रमाणिक जानकारी मिल सके. शुभकामनाएं.

घनश्याम मौर्य said...

माचू पिचू के बारे में पहली बार तभी जाना था जब 'New Seven Wonders' के लिए विश्‍वव्‍यापी ऑनलाइन वोटिंग चल रही थी। आज आपने पूरी जानकारी दी, इसके लिए धन्‍यवाद।

vidhya said...

जानकारी के लिए आभार

वर्ज्य नारी स्वर said...

सार्थक पोस्ट

दर्शन लाल बवेजा said...

इस ऐतिहासिक जानकारी को शेयर करने का शुक्रिया

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