...क्‍या फलों में भी औषधीय गुण होते हैं?

हमारे देश में आयुर्वेद की एक स्‍वस्‍थ परम्‍परा रही है, लेकिन समय के बदलने के साथ ही साथ जहां एक ओर तकनीक के विकास ने एलोपैथ की ओर लोगों का रूझान तेजी से बढ़ाया है, वहीं सहुलियत, त्‍वरित लाभ तथा बहुत हद तक फैशन ने भी लोगों को आयुर्वेद से काट दिया है। यही कारण है कि हम अपनी रोजमर्रा की चीजों के औषधीय गुणों से भी सर्वथा अपरिचित से हो गये हैं। हम अपने दैनिक जीवन में जिन फलों का सेवन करते हैं, उनमें बहुत से ऐसे गुण होते हैं, जिनसे हम अपने तमाम कष्‍टों को दूर कर सकते हैं। फलों के ऐसे औषधीय गुणों के बारे में बता रही हैं डॉ0 प्रिया वशिष्‍ठ। 
अमरूद
सुबह उठते ही अमरूद खाने से नजला, जुकाम व सिर दर्द में काफी लाभ मिलता है। 
गठिया रोग में अमरूद का सेवन काफी लाभदायक होता है। 
अमरूद की पत्तियों के रस से पाचन सम्‍बंधी बीमारियां दूर होती हैं। 
फोड़े फुन्‍सी, अल्‍सर, उल्‍टी, दस्‍त इत्‍यादि के उपयार में अमरूद की पत्तियों का अर्क लाभ पहुंचाता है। 
इसके पत्‍तों का काढ़ा मसूढ़ों की सूजन और मुंह के छालों को ठीक करता है। 

सेब 
यह कफनाशक और वीर्यवर्द्धक होता है। 
सेब अनिद्रा के रोग में काफी लाभदायक है। 
गर्मी के मौसम में मस्तिष्‍क को मजबूत करने एवं हृदय की कमजोरी दूर करने के लिए सेब के मुरब्‍बे का सेवन करना चाहिए। 
फास्‍फोरस और लौह प्रधान होने से यह मस्तिष्‍क और शरीर की मांसपेशियों में शक्ति का नव संचार कर इन्‍हें सुदृढ़ बनाता है। 
सेब के गूदे की अपेक्षा छिलके में विटामिन 'ए' भी पांच गुना अधिक होती है। 

आंवला 
यह कफ को निकालता है। 
इसकी तासीर अति शीतल है। इस कारण दिमाग को शांत करता है। साथ ही दिमाग को शक्ति प्रदान करता है। इसका नियमित सेवन सिरदर्द को दूर करने व स्‍मरण शक्ति को बढ़ाने में सहायक है। 
आंवले के सेवन से नये खून का निर्माण होता है। गर्भावस्‍था में आंवला रक्‍त की कमी को दूर करता है। साथ ही रक्‍त के सभी विकारों को भी दूर करता है। 
किसी भी रूप में आंवले का सेवन करने से उम्र बढ़ने पर भी वृद्धावस्‍था के चिह्न शरीर पर नहीं झलकते। 
पेट से सम्‍बंधित सारे रोगों में आंवला रामबाण औषधि का काम करता है। पेट व गले की जलन, खाना न पचना, खट्टी डकार, गैस व कब्‍ज में आंवले का रस या चूर्ण दूध पानी या शहद के साथ लेने से इन सभी परेशानियों से छुटकारा मिलता है। 
प्रतिदिन एक बड़ा चम्‍मन आंवले का रस शहद के साथ मिलाकर चाटने से मोतियाबिन्‍द में लाभ होता है। 

नींबू 
मोटापा दूर करने के लिए प्रात:काल एक गिलास पानी में एक नींबू का रस तथा दो चम्‍मच शहद मिलाकर पीने से लाभ होता है। 
कब्‍ज होने पर गुनगुने पानी में नींबू और शहद सुबह-शाम लेना चाहिए। 
मुंह से दुर्गन्‍ध आने पर नींबू का रस पानी में मिलाकर कुल्‍ला करने से बदबू दूर हो जाती है। 
उल्‍टी-दस्‍त होने पर ठण्‍डे पानी में नींबू तथा शहद मिलाकर पीने से आराम होता है। 
जाड़ों में नींबू का रस ग्लिसरीन व गुलाब जल मिलाकर लगाने से त्‍वचा मुलायम रहती है। इसे एड़ी, हाथों, कुहनी, मुँह आदि पर लगाऍं। 
यूरिक एसिड जो विषैला पदार्थ है, हमारे शरीर में बनता रहता है। अधिक मात्रा में बनने से आलस, शिथिलता बढ़ जाती है। रोज सुबह-शाह गर्म पानी में नींबू का प्रयोग करने से यह यूरिक एसिड को निकाल देता है।
मुँहासे होने पर मलाई मिलाकर लगाने से मुँहांसे दूर होते हैं व चेहरे पर निखार आता है। 
नींबू के छिलकों को दॉंतों पर रगड़ने से दॉंत स्‍वच्‍छ तथा सुंदर होते हैं। 

जामुन 
जामुन के बीज को सुखाकर पाउडर बना लें। इसे सुबह, शाम एक-एक चम्‍मच खाने से डायबिटीज में आराम मिलता है। 
जामुन की मुलायम पत्तियों के रस को बकरी के दूध में मिलाकर पिलाने से दस्‍त बंद हो जाते हैं। 
जामु स्‍क्‍वैश गर्मियों में बहुत उपयोगी होता है। यह शरीर को ताजगी प्रदान करता है। 
जामुन के सिरके से भूख बढ़ती है, पेट की वायु निकती है व मूत्र साफ होता है। 

बेल 
पके बेल का शर्बत पीने से अजीर्ण यानि अपच नष्‍ट होता है। 
इसकी पत्‍ती चबाने से मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं। 
यद दस्‍त की परेशानी से राहत दिलाता है। 
इसके रस को शरीर पर मलने से त्‍वचा के रोग समाप्‍त हो जाते हैं। 
कच्‍चे बेच का ताजा गूदा पीसकर खाने से पेट के दर्द में लाभ होता है। 

पपीता 
इसके उपयोग से विटामिन 'ए' व विटामिन 'सी' की कमी दूर होती है। 
इसके उपयोग से मनुष्‍य में कब्‍ज की शिकायत में लाभ होता है। 
यह मनुष्‍य में होने वाले रोग जैसे अल्‍सर, कैंसर तथा पाचन तंत्र से सम्‍बंधित अन्‍य परेशानी के निदान में भी सहायता करता है। 
पपीता स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक तथा पाचन शक्ति को बढ़ाता है। 

-डॉ0 प्रिया वशिष्‍ठ-
चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्‍वविद्यालय, कानपुर (उ0प्र0)
(उजाला, नवम्‍बर 2010 से साभार)
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मासिक धर्म -एक कुदरती प्रक्रिया

Disclaimer -यहाँ दी गयी जानकारी  केवल शैक्षिक एवं सूचना के प्रसार  हेतु है.
यह जानकारी किसी भी तरह से चिकित्सीय परामर्श या  व्यवसायिक चिकित्सा  स्वास्थ्य कर्मचारी  का विकल्प न समझी जाए.
इस जानकारी  के दुरूपयोग की ज़िम्मेदारी  लेखिका या सबाई परिवार की नहीं है.
पाठकों से अनुरोध है कि किसी भी स्वास्थ्य सम्बन्धी परेशानी में सम्बंधित चिकित्सा कर्मचारी से परामर्श करें.
विज्ञान कार्यशाला में मैं ने कहा था कि मैं स्त्रियों के स्वास्थ्य  से सम्बंधित कुछ पोस्ट ले कर  आऊंगी..थोड़ी देर से ही सही इस श्रृंखला को आरम्भ  करते  हुए आज मैं  जिस विषय पर आप से बात करूंगी वह बहुत ही महत्वपूर्ण विषय है.

चूँकि इस ब्लॉग को पुरुष भी पढते हैं तो इस पोस्ट पर यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या महिलाओं की इस 'निजी 'कही जानी वाली  जानकारी को पुरुषों को भी बताना कितना ज़रुरी है?
उसका यह जवाब है कि आज हम जिस २१ वीं  सदी में हैं उस में पुरुष के साथ कंधे से कंधा मिला कर स्त्रियाँ  भी काम कर रही हैं.ऐसे में  अब वो समय नहीं रहा जब मासिक धर्म के दिनों में लडकियों को अलग कमरे में घर से बाहर रहने को भेज दिया जाता था और इस के बारे में बात करना गलत माना जाता था.

वैसे  भी लगभग सभी को यह ज्ञात है कि यह प्रक्रिया स्त्री शरीर की एक कुदरती  प्रक्रिया है और स्वस्थ शरीर में इस प्रक्रिया के दौरान सामान्य रूटीन के कार्य करने से कोई असुविधा या हानि  नहीं होती.  हर स्त्री को इस विषय  के बारे में जानने का जितना अधिकार और आवश्यकता है ,उसी तरह हर पुरुष को भी इस प्रक्रिया को समझने की उतनी ही आवश्यकता है.

स्कूल में जहाँ लडके -लड़कियां एक साथ पढते हैं और महिला -पुरुष अध्यापक पढाते हैं ऐसे में जब किसी लडकी को पहली बार  मासिक धर्म[Menarche ] शुरू होता है या किसी लड़की को मासिक धर्म में तेज दर्द [डीस्मेनोरिया ]अचानक उठता है  तब यह स्थिति  असहजता और शर्मिंदगी  का वातावरण न बनाये इसके लिए इस सम्बन्ध में सभी को इस का  पूर्व ज्ञान /ज्ञान होना ज़रुरी है. यही बात अन्य कार्य स्थलों के  लिए भी लागू होती है.
संयुक्त अरब एमिरात में  [सरकारी नियम अनुसार ]सभी स्कूलों की  कक्षा ६ की  छात्राओं को मासिक धर्म  के बारे में व्याख्यान स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा दिया जाता है ताकि वे अपने शरीर में होने वाले इस परिवर्तन के लिए मानसिक रूप से तैयार हो सकें.
 विवाह उपरान्त गर्भ धारण करने में /परिवार को प्लान करने में भी इस जानकारी का उपयोग किया जा सकता  है.
 प्रश्न१-मासिक धर्म या माहवारी या रजोधर्म क्या होता है ?
उत्तर- यह किशोर अवस्था पार कर नव यौवन में प्रवेश करने वाली सामान्यत १० से १६ वर्ष की  लड़कियों के शरीर में होने वाला एक हार्मोनल परिवर्तन  है  जो चक्र के रूप में  प्रति मास २८ से ३५  दिन की अवधि में एक बार ३ से ५ दिन के लिए  होता है .[एमिरात  में ९ वर्ष की उम्र में भी यह चक्र शुरू होते देखा गया है.कुछ स्थानों पर ऋतुस्त्राव की अवधि  २ से ७ दिनों  को  भी सामान्य माना जाता है.]
मासिक धर्म चक्र

 इसकी प्रक्रिया को  यहाँ दी गयी विडियो में  दिए एक साक्षात्कार में डॉ.शीला गुप्ते इस तरह समझाती हैं-:

स्त्री के शरीर में दो अंडाशय और एक गर्भाशय होता है .हर माह किसी एक ओवरी से एक अंडाणु  बनता है***.जैसे जैसे यह अंडाणु परिपक्व होता है ,गर्भाशय की भीतरी सुरक्षा परत भी परिपक्व होती जाती है.जब अंडाणु पूरी तरह परिपक्व हो जाता है और  निषेचन योग्य बनता है .अगर यह निषेचित हो जाता है तो यह परत भी उसे  ग्रहण करने के लिए तैयार हो जाती है और निषेचित अंडाणु को ग्राभाशय में स्थापित करती   है जहाँ शिशु बनता है.
इस का अर्थ है कि इस परत का कार्य निषेचित  अंडाणु को आरंभिक पोषण देना है.

अगर अंडाणु  का निषेचन  नहीं होता तब यह परत बेकार हो जाती है तब मासिक धर्म के चक्र के अंत में इस परत के उत्तक  ,रक्त ,म्युकस का मिला जुला स्त्राव होता है .
यह  रक्त मिश्रित स्त्राव के रूप में योनी से  बाहर निकलता है.जिसे मासिक स्त्राव कहते हैं .
 Updated-:
***पोस्ट प्रकाशित होने के बाद ऊपर दी गयी जानकारी के विषय में माननीय दिनेशराय द्विवेदीजी   ने एक बहुत ही अच्छा प्रश्न किया -
''मेरा एक प्रश्न भी है, यहाँ कहा गया है कि .....हर माह किसी एक ओवरी से एक अंडाणु बनता है.जैसे जैसे यह अंडाणु परिपक्व होता है....
जहाँ तक मेरा ज्ञान है दोनों अंडाशयों (ओवेरी) में जितने अंडाणु होते हैं वे सभी स्त्री के अपनी माँ के गर्भ में रहते ही बन जाते हैं, और बालिका के जन्म से ही उस के अंडाशयों में मौजूद रहते हैं, केवल हर माह एक अंडाणु विकसित हो कर गर्भाशय तक पहुँचने के लिए अपनी यात्रा आरंभ करता है। क्या यह जानकारी सही है?''
---अपने प्रश्न में दिनेश  जी ने आपने बिलकुल सही बताया कि  बालिका के शरीर में  जन्म से ही  दोनों अंडाशयों  में अंडाणु मौजूद होते हैं.
इसे  थोड़ा विस्तार से जानिये -:

हम जानते हैं कि स्त्री के  गर्भाशय के  दायीं और बायीं  तरफ़ अंडाशय utero-Ovarian ligament  द्वारा   जुड़े होते हैं. माँ के गर्भ में ही female fetus में  अंडाणु बन जाते हैं जिनकी संख्या '२० हफ्ते के fetus /foetus '  में लगभग ७  मिलियन होती है ,जन्म के समय यह लगभग २ मिलियन रह जाती है .और  puberty के समय यह संख्या 300,000 - 500,000 के बीच होती है.यह कम होती संख्या 'atresia 'प्रक्रिया के कारण होती है जो एक सामान्य  प्रक्रिया है.एक पूरे reproductive  काल में  सामान्यत ४००-५०० अंडाणु ही परिपक्व पूर्ण विकसित  हो पाते हैं.[ripen in to mature egg   ] .
 पहले से मौजूद ये अंडाणु अभी अपरिपक्व होते हैं जो कि अंडाशय में फोलिकल में रहते हैं जहाँ  उनका पोषण और संरक्षण भी होता है.इस स्थिति  में ये 'संभावित अंडाणु ' potential egg भी कहे जाते हैं.

प्रस्तुत विडियो में  डॉ.गुप्ते द्वारा अंग्रेजी में दी गयी जानकारी में   'egg is formed' का अनुवाद  'अंडाणु बनता है 'किया  गया है.  यहाँ  'is formed ' भ्रामक है उस स्थिति में .[यहाँ 'अंडाणु का  विकसित होना  'वाक्य अधिक सटीक होता ].
वास्तव में    कोई भी  immature ovarian follicle /potential   egg  तब तक ' true egg ' नहीं कहलाता जब तक कि वह निषेचन  क्रिया में सक्षम न हो सके.[An immature egg can not get fertilized.]
  २८ दिन के मासिक चक्र में ओवरी में  follicle-stimulating होर्मोन के प्रभाव से follicles  mature होते हैं और नियत समयावधि  में परिपक्व egg को रिलीज़ करने के लिए तैयार होते हैं .इस दौरान कई follicles mature होते हैं लेकिन एक या दो ही dominating होते हैं वही ovulatory phase में परिपक्व ovum को रिलीज़ करते हैं .२८ दिनों ke चक्र में यह phase १२-१६ दिनों में होती है.अधिकतर केसेस में  ओवा  १४ वें दिन  रिलीज़ होता है .
सीधे  शब्दों  में  कह  सकते  हैं  कि  उन लाखों अण्डाणुओं में से   प्रतिमाह मात्र एक ova परिपक्व हो कर  रिलीज़  होता है


 प्रश्न २-गर्भावस्था  के समय माहवारी क्यूँ नहीं होती?

उत्तर - जब यह  विकसित अंडा  शुक्राणु से निषेचित होता है तब गर्भाशय  के संस्तर से जुड़ जाता है और फिर वहीं विकसित होने लगता है जिसे गर्भ ठहराना कहते हैं .इसी के साथ अब विशेष  हार्मोन का रिसाव  होता है जो इस संस्तर को  thick कर देते हैं  जिससे स्त्राव बंद हो जाता है और साथ ही कुछ खास हार्मोन इस अवधि में अंडाशय में अंडाणु का बनना रोक देते हैं.

प्रश्न ३ -क्या माहवारी के समय सभी स्त्रियों को दर्द होता है ?

उत्तर -माहवारी शुरू होने से पहले कमर /पेडू में हल्का दर्द या बेआरामी की शिकायत आम है जिसे पूर्व माहवारी दर्द  कहते हैं.
सामान्य  रूप से  इस स्त्राव के दौरान  थोड़े दर्द या बेआरामी की शिकायत  कुछ स्त्रियाँ करती हैं.तो अधिकतर कोई तकलीफ महसूस नहीं करतीं.
माहवारी  के समय बहुत सी महिलाओं में सामान्य रूप से कमर में दर्द के साथ साथ पाँव में दर्द ,शरीर में भारीपन,उलटी जैसा आना,सर दर्द,दस्त लगना या कब्ज होना,स्तनों में टेंडरनेस,भारीपन  ,मूड में बदलाव देखा गया है .
 माहवारी के दौरान बार बार तेज असहनीय  दर्द ,अत्यधिक  स्त्राव या थक्के के रूप में खून  बहना साधारण नहीं है यह किसी सम्बंधित रोग के लक्षण हो सकते हैं .इसलिए डॉक्टर से जांच अवश्य कराएं.
 प्रश्न ४-क्या महिला में मानसिक तनाव या बदलते मौसम  इस के चक्र के देर से या समयावधि से पूर्व होने का कोई कारण हैं?
उत्तर -हाँ ,ऐसा देखा गया है परन्तु इसके कोई ठोस मेडिकल कारण ज्ञात नहीं हैं.

प्रश्न ५ -महावरी के दिनों में महिलाएं अक्सर चिढ चिढ़ी हो जाती हैं ,ऐसा क्यूँ?

उत्तर -इस का कोई ठोस कारण ज्ञात नहीं है परन्तु कुछ विशेषज्ञ इस स्वभाव परिवर्तन का कारण  चक्र के समय बहने वाले  होरमोन को मानते हैं.

प्रश्न६ -क्या यह चक्र सारी उम्र चलता है ?
उत्तर -नहीं , यह चक्र स्त्री की ४० से ६० आयु के बीच में कभी भी  बंद हो जाता है .उम्र के अंतिम मासिक चक्र को रजोनिवृत्ति[  मेनोपोस] कहते हैं .अधिकतर स्त्रियों में रजोनिवृत्ति की औसत उम्र 51 साल  देखी गयी है.


प्रश्न ७ -कितना रक्त एक  चक्र में महिला के शरीर से बहता है?

उत्तर -एक सामान्य चक्र में  औसतन ३५ मिलीलीटर or  १५  to  ८० मिलीलीटर तक खून स्त्री के शरीर से बह जाता है.

प्रश्न  ८-स्त्राव के दौरान लगाये  पेड [pad ] को कितनी देर में बदलना चाहिए?

उत्तर-प्रस्तुत विडियो में डॉ शीला ने कहा है कि जब भी पेड पूरा गीला हो जाये बदल देना चाहिए और नहीं तो हर ८ घंटे में ,रात को सोने के बाद सुबह इसे  बदला  देना चाहिए .सारा दिन लगाये रखने से इस में  जीवाणु पनपेंगे जो दुर्गन्ध और इन्फेक्शन फैलायेंगे.इसलिए इस समय सफाई का खास ध्यान महिलाओं को रखना चाहिए .

प्रश्न९-मासिक धर्म के चक्र में गिनती कैसे की जाये?
उत्तर - २८ दिन के चक्र का पहला  दिन माना जाता है  जिस दिन स्त्राव शुरू होता है उस दिन से २८ दिन गिन कर २९ वें दिन से अगला चक्र शुरू होना चाहिए.
जैसे अगर १ दिसंबर को किसी को स्त्राव शुरू हुआ है तो अगला चक्र २९ दिसंबर से होना चाहिए और उससे अगला चक्र २६ जनवरी को.
डॉ गुप्ते के अनुसार मासिक चक्र को देर से या जल्दी लाने वाली दवाएं नहीं खानी चाहिए .इसका विपरीत असर चक्र की नियमितता पर पड़ता है.ऐसी हार्मोनल दवाओं के अधिक इस्तमाल करने से रक्त के जमने पर भी  प्रतिकूल असर पड़ता है.
इस विषय में फैली भ्रांतियों-विभिन्न धारणाओं  के बारे में हम अगली पोस्ट में बात करेंगे .
[इस जानकारी के स्त्रोत -विभिन्न वेब साईट और सबंधित पुस्तक ]
अब  प्रसूति व स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ. शीला गुप्ते से सुनीये और विडियो में देखीये कि मासिक धर्म क्या होता है और इस समय स्त्रियों को  स्वच्छता का किस तरह और क्यूँ ध्यान रखना चाहिए.
 Dr. (Mrs.) Sheela Gupte [M.D.],
Working at Vrundavan Hospital & Research Centre,Mapusa,Goa. is a senior consultant obstetrician and gynecologist with a special interest in fetal medicine- a super speciality  that endeavors to prevent and manage birth defects in unborn babies. A graduate in Medicine and Surgery from Nagpur, she earned her M.D. in the year 1983.In the year 2003, she earned Ian Donald Diploma in Obstetric and Gynecological Ultrasound. She has the distinction of being certified by the fetal Medicine Foundation, U.K. for early screening for chromosomal defects like Down's syndrome.


 References --Subject   related different sources

अगली कड़ी में पढ़ें मासिक धर्म से जुड़ी अवधारणाओं के बारे में
 


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सत्य को जानो


कबीर साहेब ने जो भी कहा था वह हमेशा सच ही कहा था | आज सभी उनकी बोली का प्रयोग कर रहे हैं | कबीर ने समाज की बुराइयों को दूर करने का बहुत प्रयास किया | आज भी हमारे समाज में बहुत सी बुराइयां हैं | आज भी हम अंधविश्वासों को छोड़ नहीं पा रहे हैं | आज विज्ञानं का युग है फिर भी हम उन पुरानी परम्पराओं को मानते हैं | अब हमें हर बात को आंख बंद करके नहीं मन लेना चाहिए | आज भी हमारे देश में ईश्वर के प्रति अंधभक्ति है | ईश्वर के प्रति श्रद्धा होनी चाहिए, लेकिन उस बात पर विचार भी करना चाहिए कि बात सच है या नहीं | यदि बात सच है तो अवश्य मानना चाहिए | आज इसीलिए धर्म के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है |
कबीर साहेब ने मानव सेवा पर जोर दिया कि हमें सभी दीन दुखियों की सेवा करनी चाहिए | सबसे पहले तो परिवार के लोगों की सेवा करनी चाहिए और उसके बाद अन्य सभी की |
" मानव सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है "
हमारे समाज में एक बुराई त्रयोदशी संस्कार या मृत्यु भोज , इसका एक नाम और भी है वह है तेरहवीं | यह प्रथा ठीक नहीं है जब इसे समाज के नाम पर आवश्यक माना जाता है , चाहे उसकी स्थिति इस संस्कार को करने लायक न हो |ऐसी स्थिति में तो यह प्रथा बहुत बड़ी सामाजिक बुराई है | इस के लिए कुछ सामाजिक संगठन तो बहुत प्रयास कर रहे हैं फिर भी यह प्रथा अभी भी चल रही है | आज हम २१वी सदी है लेकिन इस प्रथा को चला रहे है | यह सभी धर्मों में है वहां इसके नाम दूसरे हो सकते है लेकिन यह प्रथा ठीक नहीं है | जो गरीब है या अशिक्षित है उनसे इस प्रथा को जबरदस्ती न कराया जाये |
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..खूबसूरत क्लियोपेट्रा के बारे में कितना जानते हैं आप?


क्लियोपेट्रा का नाम लेते ही मिस्र की खूबसूरत रानी का चेहरा ज़ेहन में कौंध उठता है, जिसका जीवन ही नहीं मृत्‍यु भी किसी किवदंती के समान है। लेकिन क्‍या आपको मालूम है कि क्लियोपेट्रा नाम का एक खूबसूरत गिद्ध भी पाया जाता है, जो विलुप्ति के कगार पर है। उस गिद्ध के बारे में बता रही हैं सुश्री अल्‍पना वर्मा जी। 



क्लियोपेट्रा:एक खूबसूरत गिद्ध और चिंता का गंभीर विषय

'गिद्ध'- यह नाम सुनते ही याद आता है गंजे सर वाला भारी भरकम शरीर और  बड़े बड़े पंखों वाला बदसूरत सा पक्षी परन्तु नहीं, सभी गिद्ध ऐसे नहीं होते कुछ बेहद  खूबसूरत भी होते हैं। ...जी हाँ, मिस्र में सफ़ेद रंग के बेहद खूबसूरत गिद्ध पाए जाते हैं, जिन्हें 'फेरो का चिकन' भी कहा जाता है.इस egyptian vulture का वैज्ञानिक नाम Neophron percnopterus है.
यह  पक्षी उन कुछ चुनिन्दा जीवों में से एक है जो पत्थर का इस्तमाल दूसरे पक्षियों के अंडे तोड़ने में एक टूल की तरह  करता है .
चित्र में आप देख सकते हैं मिस्र देश का ही  एक खूबसूरत गिद्ध जिसका नाम क्लियोपेट्रा है.
मिस्र देश का  खूबसूरत गिद्ध - क्लियोपेट्रा
नीचे दी गयी वीडियो क्लिप में आप इसका खेल देख सकते हैं जिसे अलेन चिड़ियाघर में रात  के समय फिल्माया गया है.इस में देखें कैसे यह  पक्षी बड़े अंडे को पत्थर की मदद से तोड़ने का प्रयास  करता  है और छोटे अंडे को  तोड़ने के लिए ज़मीं पर मारता है.
[क्लिप में दिया  अंडा  लकड़ी का बना है इसलिए टूटेगा  नहीं.]


यह तो बात हुई एक खूबसूरत से गिद्ध और उसकी एक विशेषता की, अब जानते हैं गिद्धों के  बारे में कुछ  महत्वपूर्ण बातें। सभी जानते हैं कि इन्हें  कुदरत का  सफाईकर्मी कहा जाता है और यह एक मांसाहारी पक्षी है।

यूँ तो गिद्ध एक उपेक्षित सा पक्षी ही है लेकिन जब से  सन 1990 में एशिया में इनकी घटती संख्या की तरफ़ पर्यावरण विशषज्ञों का ध्यान गया है, तब से इसकी अहमियत के बारे में सब समझने- समझाने लगे हैं.
सन २०००  में गिद्धों को पक्षियों की लुप्त होती प्रजातियों में लिस्ट किया गया है.[“critically endangered species”].

गिद्ध न केवल भारत में बल्कि अन्य देशों से भी गायब हो रहे हैं . भारत में इन की नौ प्रजातियों की जानकारी है. जिनमें से अधिकांश उत्तराखंड में हैं, हिमालयन ग्रिफन,व्हाईट वेक्ड, सिलेन्डर बिल्ड,रैड हैडेड,इजिप्सियन,सिनेरियस,लामरगियर और लौंग बिल्ड प्रमुख है.
इनमें से लौंग बिल्ड और सिलेन्डर बिल्ड प्रजाति लगभग लुप्त प्राय हैं .उनकी घटती संख्या से सभी पर्यावरण प्रेमी चिन्त्तित हैं.

इनकी इस कमी से हम खाद्य श्रृंखला में महत्वपूर्ण कड़ी को खो रहे हैं। इसी से पारिस्थतिक संतुलन गड़बड़ा रहा है। [खाद्य श्रृंखला में पारिस्थितिकी तंत्र के विभिन्न जीवों की परस्पर भोज्य निर्भरता को प्रदर्शित करते हैं। किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र में कोई भी जीव भोजन के लिए सदैव किसी दूसरे जीव पर निर्भर होता है।]

यह भी एक तथ्य है कि जहरीले तथा सड़े हुए भोजन का भक्षण गिद्धों को प्रभावित नहीं करता है यहाँ तक कि  वे एन्थ्रेक्स और कालरा बैक्टीरिया से युक्त सड़े हुए मांस को भी खा सकते हैं। 

प्राकृतिक आपदा में भारी संख्या में मृत जीवों को खा कर सफाई का काम  कर संक्रामक रोगों को फैलने से बचाने का काम भी तो  यही पक्षी करते हैं।

पारसी समुदाय के कब्रिस्तान  [वैल आफ साइलैंस] में मृतकों के शवों को रखा जाता है जो गिद्ध कौवे या चील का भोजन बनते हैं। जब से इनकी संख्या में कमी आई है तब से मुम्बई स्थित इस पारसी समुदाय ने भी इस बारे में अपनी चिंता जतायी है।
इनकी संख्या में कमी के कई कारण बताये जा रहे हैं.जिनमें बढ़ता शहरीकरण, कीटनाशकों का प्रयोग, प्रदूषण और क्लोफेन[डाइक्लोफिनेक] नामक दवा का प्रयोग दर्द निवारण के लिए पशुओं में प्रयोग किया जाना भी एक बड़ा कारण है। 

क्लोफेन दवा से प्रभावित मृत पशु को जब गिद्ध खाते हैं। इससे गिद्धों में विसरल gout नामक बीमारी उन्हें घेर लेती है। इस बीमारी से गिद्धों के गुर्दे पूरी तरह से खराब हो जाते है, जिससे धीरे धीरे उनकी मौत हो जाती है। इस एक कारण से अब तक लगभग ४० लाख गिद्धों की मृत्यु हो चुकी है।
ज्ञात हो कि साल 2006 में जानवरों के इस्तेमाल के लिए क्लोफेन की  बिक्री और प्रयोग पर पाबंदी लगा दी गई और सन २००८ से DCGI के द्वारा जारी सूचना के अनुसार क्लोफेन दवा के लेबल  पर 'पशुओं के लिए नहीं '/“not for veterinary use”.लिखना सभी दवा  निर्माणकर्ताओं के लिए आवश्यक कर दिया गया है.
संरक्षण के उपाय-
गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत में  हरयाणा, पश्चिम बंगाल, और असम में ब्रीडिंग सेंटर बनाये गए हैं। बिहार के पटना शहर में भी इनके प्रजनन केंद्र बनाये जाने की योजना बन रही है। एक समाचार के अनुसार इसी वर्ष 2010 में पिंजौर स्थित वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर में विश्व में पहली बार किसी गिद्ध के अंडे से इन्क्युबेटर के ज़रिये बच्चे निकालने में सफल हुए हैं। यह पहला बच्चा  जिप्स इंडीकस/Gyps indicus  प्रजाति का है .
48 hrs old Gyps indicus chick
बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग प्रोग्राम के प्रमुख, डा. विभु प्रकाश के अनुसार लांग बिल्ड और व्हाइट बिल्ड वल्चर के लिए कृत्रिम घोंसले बनाए गऐ थे। जहाँ इन पक्षियों ने अंडे दिए और 57 दिन की इंक्युबेशन के बाद बॉयोलोजिस्ट्स ने इन्हें घोंसले में रखा। करीब 108 दिन तक रहने के बाद ये उड़ने लगे थे। 2015 तक इन पक्षियों को जंगल में छोड़ा जा सकता है.
पिंजोर के इसी  केंद्र ने 2008-09 में लुप्तप्राय स्लेंडर बिल्ड वल्चर यानी जिप्स टेमीरोस्टिरिस और 2007-08 व्हाइट बैक्ड वल्चर यानी जिप्स बेंगालेनसिस के अंडों से भी बच्चे पैदा कराए थे  परन्तु उस समय  ये बच्चे पक्षियों ने स्वयं अंडों से निकाले थे.
'वैज्ञानिकों  के अनुसार अगर इनके संरक्षण  के प्रयाप्त उपाय नहीं किये गए तो अगले 10 सालों में ये पक्षी दुनिया से ही लुप्त हो जायेंगे.'
रेफेरेंस:
http://www.iucnredlist.org/news/world-first-for-vultures-facing-extinction
विकिपीडिया, दैनिक भास्कर डॉट काम आदि.
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आप भी रखना चाहेंगे रेसट्रैक मेमोरी.....





हाल ही कंप्यूटर निर्माण कि एक विश्व विख्यात कम्पनी आई.बी.एम्. के वैज्ञानिको ने कंप्यूटर के क्षेत्र में एक अहम् रीसर्च है जिसका नाम है रेसट्रैक मेमोरी जिसका प्रोयोग वैज्ञानिको ने कंप्यूटर निर्माण में किया और जिससे कंप्यूटर कि स्पीड और भी अधिक हो गयी .आने वाले कुच सालो मे आप भी इसका ही फायदा उठा सकेंगे। 

रेसट्रैक मेमोरी युक्त कंप्यूटर का जो की मौजूदा पीसी से 1 लाख गुना तेज है इनमें शॉक प्रूफमेमोरी होगी, जिसके चलते बिजली की खपत भी कम रहेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा ये है कि अभी कंप्यूटर को बूट होने में 2-3 मिनट लगते हैं, क्योंकि हार्ड डिस्क की सूचनाएं रैम तक पहुंचने में वक्त लगता है। लेकिन आईबीएम के ज्यूरिक रिसर्च सेंटर के वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर चिप कोनैनोवायर से युक्त करके रेसरट्रैक कंप्यूटर बनया है जो कि 10 सेकंड में बूट हो जाएगा , क्योंकि इसके लिए जरूरी जानकारियां नैनो वायर में ही इकट्ठा रहेंगी और रेसट्रैक मेमोरी के प्रोयोग के कारण हार्ड डिस्क से सूचनाये कम से कम समय में एक्सेस और इस्टोर कि जा सकेंगी. जो इंट्रेस्टिंग बात तो ये है कि यहां तक कि इस कंप्यूटर की हार्ड डिस्क भी घूमने के बजाय स्थिर रहेगी।  

हिन्‍दुस्‍तान, 24 जरवरी 2011 में प्रकाशित
इस खोज को अगर केवल एक कंप्यूटर कि नजरिये से देखें तो शायद ये आपको इतनी फ़ाय्देमन्द ना लगे पर आप ये जानकर हैरान होगे कि आज के समय मे ग्लोबल स्तर पर कुल बिजली का 15% भाग कंप्यूटर द्वारा खर्च होता है ओर 2025 तक कंप्यूटर के बद्ते उपयोग के कारण ये प्रतिशत बढ़कर 25 होने वाला है। यानि कि 2025 तक ग्लोबल स्तर पर कुल बिजली का एक चोथायी भाग दुनिया मे प्रयोग हो रहे कंप्यूटरो मे खर्च होने लगेगा। ऐसे में आई.बी.एम्. के वैज्ञानिको द्वारा कि गयी ये खोज बहुत ऊपयोगी साबित होगी। अगर आने वाले समय मे रेसट्रैक मेमोरी युक्त कंप्यूटर प्रयोग होने लगे तो निश्चित रूप से ये समय ओर बिजली कि बचत दोनो मे ही कारगर साबित होगे।

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अस्वीकरण: यहाँ प्रकाशित सभी लेख उनके लेखकों के व्यक्तिगत मत हैं। मात्र वैज्ञानिक सोच/चेतना प्रसार के किए इसका संचालन किया जा रहा है। सभी विवादों का न्याय क्षेत्र लखनऊ रहेगा।