हम विज्ञान पत्रकारिता के कदाचार की चर्चा कर रहे थे -यहाँ यह बता देना जरूरी है कि यहाँ वर्णित कदाचार केवल विज्ञान पत्रकारिता के ही संदर्भ में सीमित अर्थ के नहीं हैं वरन पत्रकारिता के व्यापक अर्थ में इन्हें लिया जाना चाहिए .
जैसा कि वैज्ञानिकों की दुनिया और खासकर भारत में एक प्रायः घटने वाला कदाचार है अनुसन्धान पत्रों में बिना मूल अनुसन्धान किये ही अपना नाम जुडवा लेना -ऐसा अनुचित दबाव अक्सर प्रयोगशाला का हेड या संस्थान के मुखिया द्वारा प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से नए अनुसंधानकर्ताओं पर डाला जाता है -विज्ञान पत्रकारिता में भी अब देखा जा रहा है कि फंड देने वाली एजेंसियों में सम्बन्धित परियोजना का मुखिया भी ऐसी ही सोच रखता है और परियोजना की प्रोसीडिंग्स आदि में खुद को निजी हैसियत से ,जबकि वह एक सरकारी संस्थान का मात्र प्रतिनिधित्व कर रहा होता है ,प्रोजेक्ट करना चाहता है -अपना नाम प्रमुख रूप से और पहले स्थान पर चाहता है -यह किसी जेनुइन कार्य करने वाले का हक़ मारने जैसा कदाचार है .सरकारी संस्थानों में प्रमुख पदों पर बैठे स्टाफ को इस प्रवृत्ति से मुक्त होना चाहिए .और किसी भी रपट ,रिपोर्ताज में उन व्यक्तिओं का नाम अवश्य सम्मिलित हो बल्कि प्रमुखता से सम्मिलित हों जो उसके वास्तविक हक़दार हों .
एक ही रिपोर्ट /रिपोर्ताज को कई जगह न भेजें . उनमें थोडा बहुत संशोधन के साथ भी एक ही रिपोर्ट /सामाचार स्टोरी को कई जगह भेजना उचित नहीं है .हाँ उसी विषय वस्तु पर अलग दृष्टिकोण से बिकुल ताजी रिपोर्ट भले ही अन्यत्र भेजी जा सकती है .अगर आपने किसी पुस्तक की कोई समीक्षा लिखी है तो उसे दो जगह न भेजें बल्कि दो अलग अलग समीक्षाएं आप अलग जगहों पर भेज सकते हैं -क्योंकि मौलिक सृजन के कामों में काफी स्कोप होता है .
साहित्यिक चोरी का मामला बहुत बढ चला है और सृजनात्मक साहित्य के सृजन और प्रसार में बाधाएँ डाल रहा है -साहत्यिक चोरी यानी प्लेज्यरिज्म -(लातिनी मूल शब्द प्लेज्यर से उद्भूत जिसका अर्थ है अपहरण ) दूसरे के द्वारा रची सामग्री को अपने नाम से छाप लेने की दुष्प्रवृत्ति है .यह रचनाकार की सृजनात्मकता का खोखलापन उजागर करती है और एक तरह से से चौर्य प्रव्रत्ति का उदाहरण प्रस्तुत करती है .विज्ञान पत्रकारिता /संचार में तो इस प्रवृत्ति का जैसे बोलबाला ही है .विज्ञान लेखन के लोक्प्रियकरण के नाम पर काफी कुछ इधर उधर की सामग्री ,पूर्व रचनाकारों की कृतियों से बिना आभार लिए उद्धरण देने का मानो एक ट्रेंड चल पडा है -कई हिन्दी चैनलों और ब्लागरों ने इस मामले को "चोर गुरू "प्रकरणों के नए पत्रकारिता -नामकरण के तहत उछाला है -कई लेखक ऐसे पाए गए हैं जिन्होंने इंटरनेट से पुस्तकों के अध्याय के अध्याय हूबहू छाप दिए है -ऐसा कर्म निश्चित तौर पर एक बड़ा कदाचार है .यह भी देखा जा रहा है कि कुछ लेखकों ने मूल स्रोत से तो प्रचुरता से सामग्री ले ली मगर उसका हवाला नहीं दिया .एक हादसा जो इस लेखक के साथ हुआ वह तो साहित्यिक चोरी के सारे पूर्व के दृष्टान्तों को भी धता बता गया -दिल्ली स्थित एक बड़े अखबारी समूह में भेजी एक विज्ञान कथा पुस्तक की समीक्षा किसी दूसरे लेखक के नाम से छाप दी गयी और उसे मानदेय भी पकड़ा दिया गया .यह हतप्रभ करने वाली घटना थी .साहित्यिक चोरी किसी दूसरे के शब्द-समूह ,विचार और सृजन कर्म को अपने नाम से छाप देना है -यह एक बौद्धिक चोरी तो है ही धोखाधड़ी की एक आम घटना है .यह बौद्धिक विमर्श के लिए एक कलंक है और सृजन कर्म ,मौलिक चिंतन के लिए बड़ा खतरा .
साहित्यिक चोरी के कई तरीके चोर गुरुओ ने इजाद कर डाले हैं -
१-शब्दशः चोरी -पूरा का पूरा वाक्य ,पैराग्राफ टीप लेना -ये आज के 'टीपू सुलतान' चोर गुरु हैं .अंतर्जाल पर तो यह कट एंड पेस्ट तकनीक से बहुत आसान हो चला है .
२-पैराफ्रेजिंग -यहाँ भी अंतर्वस्तु तो पूरी उडाई जाती है मगर कुछ हेर फेर कर दिया जाता है ,वाक्य रचना ,शब्द थोड़ा बहुत बदल दिए जाते हैं -मूल स्रोत का उल्लेख अगर किया भी जाता है तो किसी थोड़े से हिस्से के लिए ज्यादातर उद्धरण बिना स्रोत के उल्लेख के होता है .
३-द्वितीय स्रोत से चोरी -ऐसे जगहों से उद्धरण लिया जाता है जो किसी मूल स्रोत पर आधारित होते हैं मगर लेखक उन्हें ऐसे प्रस्तुत करता है जैसे उसने मूल स्रोत का भली भांति अध्ययन किया हो .
४-विचारों की चोरी -यहाँ विचार सूत्र कहीं और से होते हैं बस शब्द लेखक के होते हैं .
५-आथरशिप की चोरी -किसी के प्रकाशित /अप्रकाशित काम को अपने नाम से छाप देना है .
जारी .....
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8 प्रतिक्रियाएँ:
Naami -giraami logon ke sahitya ki chori ko to roka nahi jaa paa raha hai...fir hamare jaiso ka agar chori bhi ho jaaye...to yahi kaha jaayega ....arey itna bada lyricist hai wo tumhara concept kyon chukayega.....Sab maya hai.....Anyways....good subject nice post
माल मत्ता है तो चोरियाँ तो होती ही रहेंगी!
इंटरनेट के इस्तेमाल ने इस तरह की फर्जी पत्रकारिता को काफी बढ़ावा दिया है. और अब तो यह देखा जा रहा ही की पूरे पूरे रिसर्च पेपर कट पेस्ट से तय्यार हो रहे हैं.
इंटरनेट और आधुनिक टेक्नोलोजी ने सूचनाओ और जानकारियो को व्यापक फलक दिया है. विचारो और तथ्यो की मौलिकता का दावा करना वैसे ही कठिन हो गया है जैसे चोरी का आरोप. रचना और विचारो पर मौलिकता की दावेदारी अब सम्भव नही है. जो दवेदार है वे भी कितने मौलिक है? विचारो, जानकारियो और ज्ञान का प्रवाह चल पडा है, गति तीव्र से तीव्रतर होती जा रही है..सभी इसके भागीदार है..कुछ फायदे है तो कुछ नुकसान भी..चलने दिजिये इस प्रवाह को..काहे की चोरी और काहे की नकल..
---अच्छा विषय है , अरविन्द जी, बधाई।
-- लाल मिर्ची ने भी ! क्या लाल मिर्ची वाली बात कही है, बधाई । ----विचार मौलिक कहां होते हैं , पढे, सुने,समझे, गुने ,विचारों के अन्तर्मंथन से ही किसी के विचार बनते हैं। इसका अर्थ ही यह है कि व्यक्ति ने ग्यान की महिमा जान कर ग्यान प्राप्ति, व प्रसार का प्रयत्न तो किया ।----हूबहू शब्दों की चोरी, बिना सन्दर्भ नहीं होनी चाहिये।
esko internet par new security technology ke dawara roka ja sakta hai par iske liye jaroori hai ki jis website par article post hai ooss par wo security technique honi chahiye taaki koi data copy naa kar sake.or esko cyber crime ke tahat bhi IT ACT ko dhyaan me rakhna jaroori hai
साहित्य चोर गुरुओं के बारे में बहुत विस्तार से और सुलझी हुई जानकारी मिली.
अच्छा विषय है और अच्छा लिखा भी हुआ है.
अच्छा गुर बता रहे हैं.. कभी आजमाते हैं.. हा हा हा.. :D
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