कल हमने विज्ञान पत्रकारिता अथवा विज्ञान संचार में नैतिक मुद्दों पर एक परिचर्चा आरम्भ की है और आरंभिक प्रतिक्रियाएं उत्साहजनक है -हम इस लेखमाला के अंत तक प्राप्त विचारों के परिप्रेक्ष्य में भी एक विस्तृत विवेचन प्रस्तुत करेगें! आईये हम विज्ञान संचार के संदर्भ में पहले उन कदाचारों की बात करें जो एक समुचित आचार संहिता बनाये जाने की मांग करते हैं .
कदाचारों को हम कई रूपों में चिह्नित कर सकते हैं -विज्ञान के तथ्यों को अपने किसी निहित स्वार्थ की पूर्ति हेतु तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना -जैसे बी टी काटन या बैगन की उपयोगिता या अनुपयोगिता से जुड़े भ्रामक आकड़ो की जन माध्यमों के बीच प्रस्तुति एक उदाहरण है -बहुराष्ट्रीय सीड कम्पनियां तीसरी दुनिया के अधिसंख्य देशों में इन जीन संवर्धित फसलों का व्यापार करना चाहती हैं -इसके लिए उन्होंने अपने समर्थन में वैज्ञानिक तथ्य जुटाए हैं -और पर्यावरण समर्थक लाबियाँ इनका विरोध कर रही है -विज्ञान पत्रकार को यहाँ किसी भी लाबी से प्रभावित नहीं होना चाहिए ,कुछ अपना भी होमवर्क करना चाहिए ,कुछ खोजी पत्रकारिता का भी दामन पकड़ना चाहिये और दूध का दूध , पानी पानी करते हुए तथ्य आम जनता के सामने लाना चाहिए! आज पूरी दुनिया में जीन संवर्धित फसलों पर विवाद छिड़ा हुआ है -भारत में भी सरकार बी टी बैगन को लाना चाहती है मगर उसे भरपूर समर्थन नहीं मिल रहा है -पत्रकारों के भी परस्पर विरोधी रपटें सामने आ रही हैं! बहुराष्ट्रीय कम्पनियां विज्ञान पत्रकारों को भी प्रलोभन दे सकती हैं -जाहिर है एक समर्पित विज्ञान पत्रकार को ऐसे प्रलोभनों से अपने दायित्व से विमुख नहीं होना चाहिए! उसका सबसे बड़ा दायित्व है जनता के समक्ष सच और केवल सच प्रस्तुत करना -तो एक कदाचार तो यही हुआ कि प्रलोभनों के आकर्षण में विज्ञान के तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत करना!
कई बार स्कूप देने की होड़ में रिपोर्टर तिल का ताड़ बना डालते हैं -ख़बरों की सनसनीखेज प्रस्तुति करते हैं ताकि ज्यादा श्रोता और /या पाठक मिल सकें ! ऐसी घटनाओं में प्रलय का आतंक ,अलौकिक दावे ,अन्धविश्वास को बढ़ाने वाले मिर्च मसाले से लिपटी खबरें जैसे नाग नागिन का प्रगट होना ,नाग का पीछा कर अपने दुश्मन से बदले लेना ,अमर कर देने वाली संजीवनी बूटी की खोज आदि खबरे हैं जिनसे इन दिनों खास तौर पर प्रसारण मीडिया -टी वी चैनेल भरे पड़े हैं -ऐसी खबरे सनसनीखेज तो हैं ही ,अन्धविश्वास को ही बढ़ावा देने वाली हैं -इन विषयों की रिपोर्टिंग में विज्ञान लेखकों को बहुत सतर्क रहना होगा -अपने समय के एक प्रसिद्ध विज्ञान पत्रकार ने दिनमान पत्रिका में रिपोर्ट छाप दी थी कि दूसरे ग्रह के प्राणियों को अमरीका ने जेलों में बंद कर रखा है -लेख से खूब सनसनी फैली -यह लेखक को भी पता था कि ऐसा कुछ नहीं है मगर फिर भी उसने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए उस खबर को एक राष्ट्रीय पत्रिका में लांच किया -विज्ञान पत्रकार के लिए इससे बढ़कर अनैतिक आचरण और क्या हो सकता है ? बात साफ़ है विज्ञान पत्रकारों को सस्ती लोकप्रियता हासिल करने के लिए ख़बरों की सनसनीखेज प्रस्तुति से बचना चहिये!
विज्ञान पत्रकार को भी यह बात ध्यान रहे कि वे एक सामाजिक सरोकार के लिए काम कर रहे हैं -यह पेशागत ईमानदारी तो है ही मगर उससे भी बढ़कर एक तरह से उनका कार्य समाज सेवा भी है - विज्ञान पत्रकारिता भी तो एक सामाजिक कार्य है! विज्ञान पत्रकार के ईमानदार प्रयास समाज का चेहरा बदल सकते हैं -आज वन्य जीवों के संरक्षण का मुद्दा बहुत प्रासंगिक है -विज्ञान पत्रकारिता के लिए अभी भी भारत में यह क्षेत्र लगभग अछूता है -वन्य पशु तेजी से विलुप्त हो रहे हैं मगर उनकी ठीक पहचान तक लोगों में नहीं है -अब जब लोग अपने वन्य पशु पक्षियों को पहचानेगें तक नही तो उन्हें बचायेगें कैसे ? आज भी बहुत से लोग है जो शेर बाघ ,तेंदुए ,चीतें में भी फर्क करना नहीं जानते और शोर मचा हुआ है कि बाघ को बचाओ ,पहले तो भई उन्हें बाघ से पहचान तो कराओ और यह समझाओ कि उनका बचा रहना क्यूं जरूरी है ? भारत में वन्य जीवन की सुरक्षा कभी भी एक जन अभियान का रूप नहीं ले सकी -इस दिशा में वन्य जीव विज्ञान पत्रकार बहुत सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं! आये दिन वन्य जीवन से जुडी खबरों में अर्थ का अनर्थ छपता रहता है -भारत के जंगल से चीतों के लुप्त हुए पचास से भी अधिक समय बीत गए मगर आज भी अख़बारों की सुर्ख़ियों में चीतों की खालों के बरामद होने की खबरे यदा कदा छपती रहती हैं -दरअसल बहुत से लोग जिन्होंने भार्गव की पुराने संस्करण की डिक्शनरी पढ़ रखी है उन्हें टाईगर का गलत अर्थ चीता ही पता है -जबकि यह बाघ /व्याघ्र है! तमिल चीते नहीं तमिल व्याघ्र होना चाहिए था -मगर वहां (राजनैतिक पत्रकारिता ) तो यह गलत शब्द भी रूढ़ बन गया मगर वन्य जीवन से जुडी रिपोर्टिंग में यह ग्राह्य नहीं है -सीख यह कि विज्ञान पत्रकार को तथ्यों की बिना पुष्टि के ख़बरों को नहीं छापना चाहिए! और इसलिए विषय के विशेषज्ञों के निरंतर सम्पर्क में रहना चाहिए!
विज्ञान पत्रकारिता के कदाचार!
जारी .....

7 प्रतिक्रियाएँ:
बहुत सही.
विज्ञान पत्रकार ही क्यों मेरा ख़्याल है कि किसी को भी तथ्यों की पुष्टि के बिना ख़बरों को नहीं ही छापना चाहिए.
विज्ञान लेखन में रूचि रखने वाले लोगों के लिए यह श्रंखला बहुत उपयोगी साबित होगी।
Satya Vachan.
bina sachachi ko jane khabaro ko chhapana hi galat hai kyoki jabtak bahut der ho chki rahti hai aur itani der me kisi ki duniya bhi badal jaati hai.
poonam
बहुत उपयोगी लगी यह जानकारी शुक्रिया
Very Interesting!
Thank You!
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