एक पुराना चुटकुला है। जब मा0 अटल बिहारी जी भारत के प्रधानमंत्री थे, तो बिल क्लिंटन जी ने उनको फोन किया और पूछा- 'ये 'जुगाड़' कौन सी टेक्नालॉजी है? सुना है ये बड़ी गजब की चीज है। जहरा हमको भी तो इसके बारे में बताइए।' इसपर अटल बिहारी जी बोले- 'नहीं भई, हम इसके बारे में नहीं बता सकते। इस पर क्लिंटन महोदय ने पूछा- 'अरे भई, इसमें छुपाने वाली कौन सी बात है?' तब अटल बिहारी जी ने शरमाते हुए कहा- 'अरे भई, इसी बहाने हमारी सरकार चल रही है और आप चाहते हैं कि मैं इसका राज़ आपको बता दूँ?' खैर ये तो चुटकुला था। पर अब जुगाड़ पर वैज्ञानिक भी ध्यान केन्द्रित कर लिया है। 'ग्लोबल वार्मिंग' से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने क्या जुगाड़ अपनाया है, बता रहे हैं मनोज बिजनौरी जी।आज हर व्यक्ति पर्यावरण की बात करता है, प्रदूषण से बचाव के उपाय सोचता है। व्यक्ति स्वच्छ और प्रदूषण-मुक्त पर्यावरण में रहने के अधिकारों के प्रति सजग होने लगा है और अपने दायित्वों को समझने लगा है। वर्तमान में विश्व ग्लोबल वार्मिंग के सवालों से जूझ रहा है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए विश्व के अनेक देशों में वैज्ञानिकों द्वारा प्रयोग और खोजें हुई हैं। उनके अनुसार अगर प्रदूषण फैलने की रफ्तार इसी तरह बढ़ती रही तो अगले दो दशकों में धरती की औसत तापमान 0.3 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक के दर से बढ़ेगा। यह चिंताजनक है।
पर्यावरण का विषय-क्षेत्र इन सारी चिंताओं को अपने-आप में समेटे हुए है। पर्यावरण संबंधी चिंताओं ने समूचेमानव समुदाय को झकझोर कर रखा दिया है। कहा जाता है कि मानव इस जीवन जगत् में सबसे बुद्धिमानप्राणी है। शायद यह कहना सच भी है, लेकिन पर्यावरण की समस्या ने मानव बुद्धि को चकरा दिया है।
सारी मानव जाति आज के ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ से सामने की दिशा में पूर्वत्तर आगे बढ़ते जाना अपने कोमौत के मुंह में ढकेलने के बराबर है। लेकिन लौटकर पीछे जाना स्वयं ही जंगली आदम-सभ्यता को स्वीकारलेना होगा। समस्या सचमुच बड़ी जटिल है। पीछे लेना होगा। पीछे लौटकर न तो हम मानव सभ्यता केगौरवपूर्ण इतिहास को झुठलाना चाहेंगे और न ही आगे बढ़ते हुए अपनी सुंदर सभ्यता नष्ट करना पसंद करेंगे।
सारी मानव जाति आज के ऐसे दोराहे पर खड़ी है जहाँ से सामने की दिशा में पूर्वत्तर आगे बढ़ते जाना अपने कोमौत के मुंह में ढकेलने के बराबर है। लेकिन लौटकर पीछे जाना स्वयं ही जंगली आदम-सभ्यता को स्वीकारलेना होगा। समस्या सचमुच बड़ी जटिल है। पीछे लेना होगा। पीछे लौटकर न तो हम मानव सभ्यता केगौरवपूर्ण इतिहास को झुठलाना चाहेंगे और न ही आगे बढ़ते हुए अपनी सुंदर सभ्यता नष्ट करना पसंद करेंगे।
‘इधर मौत उधर खाई, के इस द्वंद्व को मिटाने का एक ही उपाय है। एक नये रास्ते कानिर्माण, एक नई दिशा में प्रस्थान, इसी नई दिशा की खोज का प्रयास है पर्यावरणविज्ञान। लेकिन हम किसी भी दिशा में तो चल नहीं सकते। प्रकृति का संतुलन बड़ानाजुक है। इस नाजुक संतुलन को बनाए रखते हुए ही हम अपनी नई दिशा तलाश सकते हैं। कभी भी अगरहम चूके तो पहाड़ी से फिसलते हुए व्यक्ति की तरह कहाँ जा गिरेंगे, कोई ठिकाना नहीं।
इसलिए आपके लिए लाये है एक आसान सा जुगाड़
एक तरफ जहां दुनियाभर के वैज्ञानिक ग्लोबल वार्मिग से निपटने के लिए जमीन-आसमान एक कर रहे हैं, वहीं अमरीका के वैज्ञानिकों ने शहरों को ठंडा रखने का एक बहुत आसान उपाय पेश किया है। वैज्ञानिकों का दावा है कि इमारतों की छतों को सफेद रंग से पोत कर शहरों को आसानी से ठंडा रखा जा सकता है। मुख्य शोधकर्ता कीथ ओलेसन ने कहा कि हमारा शोध बताता है कि सफेद छतें शहरी गर्मी को कम करने का प्रभावी तरीका हो सकती हैं। इसमें शहरों को ठंडा रखने और ग्लोबल वार्मिग के कई पहलुओं को कम करने की पर्याप्त सामथ्र्य होती है। दल ने पाया कि अगर पूरी दुनिया की सभी छतों को पूरी तरह सफेद रंग से पोता जाए, तो शहरी गर्मी को 33 फीसदी तक कम किया जा सकता है। ओलेसन ने कहा कि इससे दुनिया के सभी शहरों का तापमान औसतन 0.7 डिग्री फारेनहाइट तक कम किया जा सकता है।
छतों पर डलने वाली एसफाल्ट रोड, टार्फेल शीट और अन्य कृत्रिम सामान सूर्य से गर्मी अवशोषित करते हैं, जिससे शहर में गर्मी का प्रभाव पैदा होता है, जो शहरों के तापमान को औसतन दो से पांच डिग्री तक बढ़ा देता है। "साइंस डेली" की रिपोर्ट के अनुसार, अपने प्रयोग के लिए वैज्ञानिकों ने एक नव विकसित कम्प्यूटर मॉडल का उपयोग किया, जिसके मार्फत वैज्ञानिकों ने दुनियाभर के शहरों का अलग-अलग प्रकार का आदर्श रूप प्रस्तुत किया।
शोध में कहा गया है कि गांवों की तुलना में शहर जलवायु परिवर्तन के प्रति ज्यादा संवेदनशील हैं क्योंकि शहर गांवों की तुलना में ज्यादा गर्म होते हैं। इसमें कहा गया है कि सफेद छतें गर्मी की कुछ मात्रा को अंतरिक्ष में वापस परावर्तित कर देती हैं, जिससे तापमान कम हो जाता है। यह उसी तरह होता है, जैसे गर्मी के दिनों में सफेद कपड़े पहनने से काले कपड़ों की तुलना में कम गर्मी लगती है।
हालांकि, दल ने चेतावनी दी है कि उनके शोध की अवधारणा के हिसाब से इसके वास्तविक रूप में आकर ग्लोबल वामिंüग कम करने में कुछ बाधाएं आ सकती हैं। इसमें कहा गया है कि वास्तविक दुनिया में तापमान कम करने का प्रभाव कुछ कम हो सकता है क्योंकि समय के साथ सफेद पेंट धूल के कारण गहरा होता जाएगा।
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13 प्रतिक्रियाएँ:
श्री पंकज अवधिया ने पिछली साल पोस्ट लिखी थी - छत पर चूने की परत लगाने के विषय में। अपने उस प्रयोग पर आगे का अपडेट दे रहे हैं इस पोस्ट में। आप पायेंगे कि अनेक वनस्पतियां गर्मियों से राहत देने में प्रयोग की जा सकती हैं।
http://halchal.gyandutt.com/2009/04/blog-post_24.html
बढिया उपाय है। इसे अपनाया जाना चाहिए।
Lagta hai Scientist bhi avadhiya ji se inspired hain.
Lekin dekhna ye hai ki ise kitte log apnayenge?
Ye ek saarthak upay hai, jise apnaya chahiye.
waise kachhe ghar banaye jayen to?
Ankit bhai, lekin uska mentinence kaun jhelega?
are chote ghar kachhe bana dijiye aur bade bhavan pracheen shaili me jaise purane kile bante the
इसे तो फौरी तौर पर आजमाना चाहिए.
वाह...!
जुगाड़ तो बहुत काम की चीज है!
इसे कहते हैं जहाँ चाह, वहाँ राह।
ju gaad
भाई इस जुगाज़ ने तो कमाल कर दिया ... अच्छी जानकारी दी है ...
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