विज्ञान की अजीब Theories (1)

2010 में साइंस ब्लोग्गेर्स पर अपनी इस पहली पोस्ट से शुरुआत कर रहा हूँ एक नयी श्रृंखला की. आशा है यह श्रृंखला आपको पसंद आएगी.
समान्तर ब्रह्माण्ड  (Parallel Universe) :

क्या आपको मालूम है कि इस यूनिवर्स में आपकी कापी मौजूद है? आप यहां कम्प्यूटर पर बैठे ब्लाग पढ़ रहे हैं और आपकी वह कापी मैदान में फुटबाल खेल रही है?
जी हाँ। वैज्ञानिकों ने कॉसमास का जो सबसे आसान माडल गणितीय गणनाओं के आधार पर बनाया है उसमें ऐसा संभव है। और आपकी वह कॉपी कुछ इतने मीटर की दूरी पर है कि आप 1 लिखकर उसके आगे 29 शून्य लगा दें और फिर 10 को इतनी बार गुणा कर दें। साइंस की इस थ्योरी का नाम है समान्तर ब्रह्माण्ड (Parallel Universe) जिसमें हमारे ब्रह्माण्ड से इतर ब्रह्माण्डों की कल्पना की गयी है।
दरअसल इंसान जब सितारों से भरे यूनिवर्स को देखता है तो उसके दिमाग में सवाल उठता है, ‘क्या सिर्फ यही ब्रह्माण्ड है?’ इस सवाल का जवाब ढूंढने की कोशिश जब वैज्ञानिक करते हैं तो पैदा होता है समान्तर ब्रह्माण्ड का सिद्धान्त।
वर्तमान में ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के सम्बन्ध में जो सर्वाधिक मान्य थ्योरी है वह है बिग बैंग का सिद्धान्त। जिसके अनुसार आज से लगभग 14 मिलियन साल पहले एक महाविस्फोट हुआ था जिससे ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ और तब से यह ब्रह्माण्ड लगातार फैल रहा है। इस समय के अनुसार जब गणना की गयी तो मालूम हुआ कि सर्वाधिक दूर वस्तु जो हम देख सकते हैं हमारी आँखों से इतने मीटर दूर है कि चार के आगे 26 शून्य जोड़ दिये जायें। इस अधिकतम दूरी के गोले को नाम दिया गया है हब्बल वोल्यूम।
वैज्ञानिकों ने कल्पना की है कि हब्बल वोल्यूम यानि हमारा यूनिवर्स एक अनन्त विस्तारित मल्टीवर्स (बहुब्रह्माण्ड) का बहुत छोटा सा हिस्सा है। मल्टीवर्स में हमारे यूनिवर्स जैसे अनेक यूनिवर्स हैं। सभी में भौतिकी के नियम एक जैसे पाये जाते हैं। यानि गुरुवाकर्षण नियम, कूलाम्ब नियम जैसे नियम दूसरे ब्रह्माण्डों में भी उसी प्रकार हैं जिस प्रकार हमारे ब्रह्मण्ड में। फर्क है तो प्रारम्भिक अवस्थाओं का। यानि एक यूनिवर्स में कोई व्यक्ति सुबह देर तक सो रहा है तो हो सकता है दूसरे यूनिवर्स में वही व्यक्ति सुबह उठकर जागिंग करने चला जा रहा है।
ये तो इस थ्योरी की शुरुआत भर है। दरअसल समान्तर ब्रह्माण्ड की पूरी थ्योरी को चार लेवेल में रखा गया है और अभी हमने जिस यूनिवर्स की बात की वह था लेवेल एक का यूनिवर्स।
इससे पहले कि दूसरे लेवेल्स की बात की जाये, ये बताना जरूरी है कि समान्तर ब्रह्माण्ड के ये लेवेल किस आधार पर बनाये गये हैं।

भौतिक विज्ञान के आधार पर अगर कई ब्रह्माण्ड जूद हैं तो हर ब्रह्माण्ड में कुछ भौतिकी के नियम होते हैं और कुछ प्रारम्भिक अवस्थाएं होती हैं जिनसे उत्पन्न होकर वह आगे विकास करता है। इस तरंह लेवेल एक के ब्रह्माण्ड वे हुए जिनमें भौतिकी के नियम तो एक ही जैसे होंगे किन्तु प्रारम्भिक अवस्थाएं अलग अलग होंगी।
अब बात करते हैं दूसरे लेवेल की। इस लेवेल में कल्पनानुसार अनन्त ब्रह्माण्ड बिग बैंग विस्फोट द्वारा पैदा होते रहते हैं और फिर समाप्त हो जाते हैं। ठीक उसी तरंह जैसे पानी में बुलबुले पैदा होते रहते हैं और फिर नष्ट हो जाते हैं। इन बुलबुले रूपी ब्रह्माण्डों में भौतिकी के नियम तो समान रूप से लागू होते हैं किन्तु उनके नियतांकों का मान अलग अलग होता है। मिसाल के तौर पर हमारे ब्रह्माण्ड में प्रोटॉन इलेक्ट्रान से दो हजार गुना भारी होता है। हो सकता है दूसरे ब्रह्माण्ड में यह बीस हजार गुना भारी हो। साथ ही विमाओं की दृष्टि से भी एक ब्रह्माण्ड दूसरे से अलग होता है। सबसे खास बात ये कि यदि एक ब्रह्माण्ड में रहने वाला कोई भी व्यक्ति प्रकाश के वेग से भी यात्रा करे तो भी दूसरे ब्रह्माण्ड तक नहीं पहुंच सकता। क्योंकि ब्रह्माण्डीय बुलबुले के फैलने की रफ्तार प्रकाश के वेग से कहीं यादा होगी। यानि दूसरे ब्रह्माण्ड की किसी घटना को देख पाना संभव नहीं। (फिलहाल! भविष्य के बारे में कौन जानता है।)
तीसरे लेवेल का यूनिवर्स क्वांटम भौतिकी पर आधारित है, और सिर्फ वर्तमान बल्कि भविष्य के ब्रह्माण्ड की भी तस्वीर सामने रखता है। इस थ्योरी में भविष्य में घटने वाली कोई भी घटना वर्तमान घटना से गणितीय रूप में जुड़ी होती है और उसके साथ एक प्रोबेबिलिटी (संभावना) भी जुड़ी रहती है कुछ कुछ हिन्दी फिल्मों की कहानी की तरंह, जिनमें एक लड़की और दो लड़कों के बीच लव ट्राईएंगिल शुरू होता है। इस कहानी के कितने अंजाम संभव हो सकते हैं, उतने ही लेवेल थ्री के यूनिवर्स बन जाते हैं।
लेकिन तीनों लेवेल भौतिकविज्ञानियों और आम मनुष्य के एक प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हैं। वह है हमारे यूनिवर्स की फाइन ट्यूनिंग। (फाइन ट्यूनिंग के बारे में विस्तार से अलग पोस्ट में चर्चा होगी।)

फाइन ट्यूनिंग की समस्या हल करते हुए यूनिवर्स के चौथे लेवेल का विचार ज़हन में आता है। इस लेवेल में प्रत्येक ब्रह्माण्ड का अपना एक अलग गणितीय माडल होता है। उस ब्रह्माण्ड के सभी भौतिक नियम उस माडल के अनुसार होते हैं। दूसरे ब्रह्माण्ड का गणितीय माडल बदल जाता है नतीजे में वहां के नियम भी उसी प्रकार से बदल जाते हैं। अब चूंकि गणितीय माडल अनन्त तरंह के मुमकिन हैं इसलिए ब्रह्माण्ड के स्ट्रक्चर भी अनन्त तरंह के हुए, जिनका अध्ययन वही कर सकता है जिसके पास अनन्त बुद्धिमता हो।

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22 प्रतिक्रियाएँ:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

परिकल्पनाओं की पूरी छूट है।

Mithilesh dubey said...

अच्छी जानकारीं रही, आभार आपका ।

Anonymous said...

This is first post in this blog site which had some informative value !!!

Ankit.....................the real scholar said...

अब तो कम से कम ज्योतिष , इश्वर , आध्यात्म और तत्व मीमांस पार संदेह करना बंद करना चाहिए

हमे प्रतीक्षा है fine tuning पर लेख की| जल्दी से लिखिए

ACHARYA RAMESH SACHDEVA said...

EXCELLENT.
YOU HAVE CREATED HISTORY BY GIVING INFORMATION ON BLOG.
CONGRATS

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

जीशान भाई, इस रोचक और महत्वपूर्ण श्रृंखला के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आपकी पुरानी श्रृंखला की भांति यह भी लोकप्रियता के नए रिकार्ड कायम करेगी।

Tarkeshwar Giri said...

बहुत ही मजेदार लेख है पढ़ कर के मजा आया

अन्तर सोहिल said...

कल्पनात्मकता जबरदस्त है

ध्यान से नही पढा है, समझ नही पाया हूं
दोबारा पढना पडेगा

प्रणाम

Murari Pareek said...

जानकारी तो उम्दा है पर क्या ये सच हो सकता है की मैं या मेरा जैसा कहीं और भी मौजूद है ! एक एक फिल्म देखि थी "द वन" जिसमे अपनी ही शक्लसुर्त वालूँ को मारते जाता है ओर उनका सारा बल उसमे आता जाता है !!

नन्हीं लेखिका - Rashmi Swaroop said...

bahut mazaa aaya ye jaanne me...
I just love science !!
x.

Priya said...

bahut hi informative...infact aapne to hamari knowledge badha di...itna kuch to nahi jaante they ham.... Pls. keept writing expecting more from you.

Aacharya Ranjan said...

बहुत ऊपर से निकल गया सर जी - आचार्य रंजन

डा. श्याम गुप्त said...

अन्कित के कथन पर भी ध्यान दे. यह परिकल्पना सत्य ही है--वेदिक साहित्य में असन्ख्य ब्रह्मान्डों के बारे में विवरण है( यह मेरे आलेख ,श्रिष्टि व ब्रह्मान्ड. में वर्णित है)
---मुरारी पारिक का "द वन’--- रामायण में एक पात्र, वालि- सुग्रीव का भाई, वानर राज- था जिसे वरदान था कि अप्ने सामने वाले का आधा बल उसमें आजाता था, अतः राम ने उसे छिपकर मारा था

Yogesh said...

यकीन जानिये, ज्योतिष कहे या विज्ञान,
लेकिन अगर आज की तारीख़ में मुझ से पूछा जाए, तो मेरे लिए असंख्य ब्रम्हांड की कल्पना करना भी नामुमकिन है.

Why would a 3D universe be more than one? Why can't it be called a single one? What differentiates the two.

अगर Vertical plates होती जिसे हम universe कहते तो बात फिर भी समझ में आती थी.

वैसे This article is too complex to understand and the usage of complex Hindi words make it even more complex.

zeashan zaidi said...

योगेश जी, ब्रह्मांडों की कल्पना प्रकृति या भौतिकी के नियमों के आधार पर की गई है. हमारे ब्रह्माण्ड में हर जगह प्रकृति के नियम एक जैसे दिखाई देते हैं. तो ऐसे ब्रह्माण्ड संभव हैं जहां प्रकृति के नियम अलग हों.या नियम एक हों लेकिन बिग बैंग द्वारा शुरुआत अलग हो गई हो. रही बात 3D की तो गणितीय रूप से विमायें अनत हो सकती हैं. फिलहाल M Theory ग्यारह विमाओं की बात करती है.

Yogesh said...

लेकिन मेरे लिए तो 4D की कल्पना मात्र करना भी मुश्किल है

When 3 dimensions are necessary and sufficient to locate any point in the universe, why would one require more than 3 dimensions?

Tell me honestly, are you able to visualize how 4D or 5D looks like? I am not.

I cannot draw a line that is perpendicular to all X, Y and Z axis. This is what is my understanding of 4D is. Where it is a possible to draw a line which is perpendicular to all, X Y and Z axis.

zeashan zaidi said...

अंकित जी, Fine Tuning पर मेरी एक सीरीज यहाँ जारी है. यूनिवर्स - एक इंटेलिजेंट डीजाइन नाम से.

zeashan zaidi said...

योगेश जी, जब आप स्पेस में किसी पास की चीज़ की लोकेशन बताते हैं तो 3D से काम चल जाता है, लेकिन जब स्टार्स वगैरह की लोकेशन बताना चाहेंगे तो साथ में समय भी बताना पड़ेगा. क्योंकि स्टार्स करोड़ों प्रकाश वर्ष दूर हैं. अर्थात जब हम उनकी लोकेशन देखते हैं तो वह करोड़ों वर्ष पुरानी होती है. वर्तमान में तो वह कहीं का कहीं होता है. इसलिए उसकी लोकेशन में 3D के साथ समय भी जोड़ना होता है. अर्थात 4D.

Yogesh said...

Zeashan zaidi,

Kudos !! What a brilliant explanation.
Why time is required..
I have read at many places that fourth dimension is time. But no body explained why !!!

That's correct that you have explained.

Just curious to know, how is time measured? I mean, what is time=0, is that start of the universe?

More-over, time is also not absolute, it is also relative. So how is this tackled? Khair, leave it, the more we discuss relativity, the more complex it gets...

Any example of 4D coordinates
Let me think of one..

(2500 light year, 1000 light year, 1500 light year, ?????)

What will be in place of time here?

Ankit.....................the real scholar said...

योगेश जी , 5 तो नहीं परन्तु ४ विमाओं की कल्पना करने में हूँ समर्थ मैं

और आपभी हो सकते हैं यदि आप स्टेफेन हाकिंस की किताब 'a breef history of time ' या उसका हिंदी अनुवाद ' समय का संक्षिप्त इतिहास ' पढ़े

मैंने हिंदी वाली पढ़ी है और ४ विमायें समझ में आ गईं और ये भी की विमायें कितनी भी हो सकती हैं

Arvind Mishra said...

इस जबरदस्त शुरुआत के लिए खुशामदीद !

PD said...

कई साल पहले "जेट ली" अभिनीत एक सिनेमा आई थी उसकी याद आ गई.. उसका नाम था "The One".

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