या इलाही ये माज़रा क्या है? -सलीम ख़ान

ज्यादा दिन नहीं हुए। बस चार दिन पहले की बात है, जब मियाँ ठंड के कारण गिनती के तीन बने जा रहे थे। तब जिसे देखो वही यही दुआ मनाता फिर रहा था कि जल्दी से इस सर्दी को विदा करो। अब तो इसने सचमुच नाक में दम कर दिया। लेकिन पिछले दो दिनों में ऐसा पासा पलटा कि अब रहा नहीं जा रहा है। सूरज इतनी तेज़ चिन्गारी छोड़ने लगा है, जिसे बर्दाश्त करना दूभर हो रहा है। लेकिन क्या आपको पता है कि अगर यही हालात बने रहे, तो सन 2030 तक इतनी गर्मी पड़ेगी कि आदमी जिसे सहना असहनीय हो जाएगा। कैसे? बता रहे हैं ब्लॉगर सलीम खान

मानव द्वारा की जा रही अप्राकृतिक गतिविधियों के कारण बढ़ते जल प्रदुषण से जल निकायों (नदियों, झीलों, समुद्रों और भूगर्भीय जल) पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है और अगर इंसान इसी तरह अपने नितांत निजी फ़ायदों और सिर्फ़ वर्तमान लाभों की पूर्ति हेतु अपना यह दुष्कृत्य करता रहेगा तो वह दिन दूर नहीं जब इस पृथ्वी पर पेय जल के प्राकृतिक स्रोत अपना मूलभूत अस्तित्व खो देंगे! ज़रा सोचिये, अगर ऐसा हुआ तो हमारे पास इस क्या समाधान होगा? मैंने इस बारे में कुछ लोगों से बात की तो पाया कि कुछ इस मसले पर वाक़ई गंभीर थे और उन्होंने यह अहद (प्रण) लिया कि वे भविष्य में अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करेंगे कि जल-प्रदुषण न हो वहीँ कुछ ने जल प्रदुषण के समाधान के तौर आधुनिक होते विज्ञान के अविष्कार की तरफ़ तवज्जोह दिलाई और जल प्रदुषण पर किसी भी तरह की चिंता से इन्कार किया. उनका तर्क था कि यदि विज्ञान पानी के विकल्प के रूप मे कुछ खोज ले तो ये एक सकारात्मक दृष्टिकोण होगा क्यूंकि निरंतर तेज़ी से बढ़ते वैज्ञानिक आविष्कारों को देखते हुए यह कोई मुश्किल काम नहीं!!

क्या मानव की यह सोच सही है, अगर हाँ तो यह सोच मानव के लिए खुद अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के बराबर है. मिसाल के तौर पर एक व्यक्ति एक सामान को तोड़ रहा है और उससे जब पूछा जाता है कि भैया ! ऐसा क्यूँ कर रहे हो? सामान को तोड़ोगे तो तुन्हें कितना नुक्सान हो जायेगा? तो प्रत्युत्तर में वह कहता है कि "कोई चिंता नहीं है मैं इस के विकल्प में दूसरा सामान क्रय कर लूँगा!" वैसे तो यह तर्क सामान्य सा है लेकिन क्या यह तर्क किसी समस्या के वृहद् रूप में कारगर साबित हो सकता है? तो मेरा जवाब है"नहीं"!!!

मानव द्वारा की जा रही अप्राकृतिक करतूतों का खामियाज़ा सिर्फ़ जल संकट ही पैदा नहीं कर रहा है बल्कि ज्वालामुखी, सुनामी अथवा कटरीना जैसे तूफ़ान और ज़लज़ले (भूकंप) को भी असमय विनाश की दावत दे रहें हैं. उधर जल की गुणवत्ता, जल की पारिस्थितिकीय स्थिति में तब्दीली को जल प्रदुषण के रूप में नहीं देखा जा रहा है!

जल प्रदुषण के कई कारण हैं. जैविक अपशिष्ट पदार्थ इनमें से एक है. जल प्रदुषण ही नहीं पूरी पारिस्थितिकी प्रणाली पर जैविक अपशिष्ट पदार्थों ने प्रतिकूल प्रभाव किया है जैसे मल-विसर्जन, कृषिकीय अपशिष्ट पदार्थ आदि. जिसके कारण जल में ओक्सीज़न की मात्रा में कमीं आती है. द्योग कचरा जैसे भारी धातु, कार्बनिक ज़हर, तेल, खाद्य पदार्थ, पोषक तत्व व ठोस पदार्थों आदि का 'विसर्जन' भी जल प्रदुषण में अपनी करामात दिखा रहा है. 

अपशिष्ट पदार्थ की वजह से सिर्फ़ जल प्रदुषण ही नहीं  हो रहा है बल्कि ओक्सीज़न की मात्रा में भी कमी हो रही है एवम ग्लोबल वार्मिंग में भी इज़ाफा हो रहा है. एक आकंडे के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग की यह गति जारी रही तो सन 2030 तक इतनी गर्मी पढेगी जो हम मानव सह नहीं सकेंगे.

तो आईये हम सभी मिल कर आज से यह संकल्प लें कि हम पूरी कोशिश करें कि हमारे हाथों आज से किसी भी प्रकार का जल प्रदुषण नहीं होगा और हम इसके रोकथाम के लिए भरक कोशिश करें!

24 प्रतिक्रियाएँ:

Kunnu said...

Badhiya hai.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

किसी भी बहाने ये अलख जगती रहनी चाहिए।

Khursheed said...

या ईलाही ये माज़रा क्या है, ज्ञान से विज्ञान तक पहुँचने का रास्ता क्या है.

अच्छी पोस्ट साधुवाद

सलीम ख़ान said...

ज़ाकिर भाई , मैं अपनी और अपनी कलम की तरफ़ से पूरी पूरी कोशिश करूँगा !!!

Dr. shyam gupta said...

बहुत अच्छा कहा ,इसे कहते हैं -पहले गड्डा खोदना फ़िर उसे भरने का उपाय खोज़ना. अच्छी पोस्ट, बधाई.
----अपने पैर कुल्हाडी मारने वाले यह भी कह सकते हैं कि--कोई बात नही, जब सब मरेंगे तो हम भी, क्या चिन्ता.

डॉ. मनोज मिश्र said...

जिसनें दर्द दिया-वही दवा देगा.

डॉ. मनोज मिश्र said...

जिसनें दर्द दिया-वही दवा देगा.

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

या इलाही ये माजरा तो चर्चा मंच पर सबसे पहले है!
http://charchamanch.blogspot.com/2010/01/blog-post_30.html

Ankit.....................the real scholar said...

bilkul nai hoga

kam se kam hamare hanton se nahi hi hoga

Ankit.....................the real scholar said...
This comment has been removed by the author.
सलीम ख़ान said...

Dr. Syam jee, sahi kaha aapne !!!

सलीम ख़ान said...

shashtri jee, dhanywaad is post ko charcha manch par prakashit karne ke liye !!!

सलीम ख़ान said...

डॉ. मनोज मिश्र jee,

sahi kaha aapne !!!

Anonymous said...

तुम सर्वथा अपनी शक्ति को भ्रमित होकर ज्ञान से विज्ञान की तरफ चला आया है. तुम्हारा वास्तविक स्थान वहीँ है वरना अपना अस्तित्व खो दोगे. चले आओ लौट कर.

सलीम ख़ान said...

Anonymous jee,

aap meri har post par kuchh isi tarah ki tippani karke muujhe pareshaan na karen. mujhe maloom hai ki meree kahan kya likhna hai.

waise GYAN aur VIGYAN dono ek dusre ke poorak hai aur dono ka lakshy ek hi hai.

समीउद्दीन नीलू said...

बहुत बढ़िया और सोचने पर मजबूर कर देने वाला लेख. सलीम, तुम इसी तरह अपनी प्रतिभा को निखारने में लगे रहो. वह दिन दूर नहीं जब तुम अपने जायज़ मक़ाम पर पहुँच चुके होगे.

समीउद्दीन नीलू said...

बहुत बढ़िया और सोचने पर मजबूर कर देने वाला लेख. सलीम, तुम इसी तरह अपनी प्रतिभा को निखारने में लगे रहो. वह दिन दूर नहीं जब तुम अपने जायज़ मक़ाम पर पहुँच चुके होगे.

कविता said...

Prerak lekh.

Meenu Khare said...

बहुत अच्छी पोस्ट लिखी है सलीम! बधाई. आपकी लेखन शैली रोचक होने के साथ वस्तुनिष्ठ भी है.अच्छा लगा पढ कर.

Arvind Mishra said...

सलीम बहुत रोचक लिख रहे हैं आप -जारी रहें !

सलीम ख़ान said...

@Meenu Jee aur Arvind Sir,

Thanks!!!

manav vikash vigan aur adhatam said...

aap ka blog hindi me caaphi achcha hai mai bhi vighan ke samachar likata hoo aapse joorana chahata hoon

Anonymous said...

kitna accha blog hai.

Anonymous said...

didi man gaye kitna achcha likhti ho. laddoo.

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