अजब गज़ब तथ्य : कामयाब औरतों में स्ट्रेस बन रहा है कील मुहांसों का सबब.

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एक नए अध्ययन के अनुसार युवतियों की ज़िन्दगी में खासकर उम्र के बीसम बीसे के मध्य में (मिड त्वेंतीज़ में) उन युवतियों में स्किन प्रोब्लम के रूप में कील मुंहासे की समस्या देखने को मिली है जो कामयाबी की मंजिले एक के बाद एक चढ़ती चली जाती हैं.

माहिरों के अनुसार शायद इसकी एक वजह पिछली पीढ़ी के बरक्स इस पीढ़ी की औरत का साबका (मुकाबला) स्ट्रेस से अपेक्षाकृत ज्यादा होता है नतीज़न इसी दवाब के चलते ज्यादा मात्रा में पुरुष हारमोन पैदा हो रहें हैं जो तेल के उत्पादन को हवा दे रहा है, रोमकूप बंद हो रहें हैं तैलीय ग्रंथि अति-सक्रिय हो रही है. मजेदार बात यह है इन युवतियों का चेहरा किशोरावस्था में बेदाग़ था लेकिन मिड त्विन्तीज़ में चेहरे पर स्पोट्स ही स्पोट्स.

चमड़ी रोगों के माहिरों के अनुसार अपनी प्रकृति में भी युवावस्था के ये मुंहासे किशोरावस्था के एकने से फर्क हैं, जुदा हैं. किशोरावस्था में इनका फैलाव "T-ZONE" यानी ठोड़ी, नासिका और मस्तक के गिर्द रहता है जबकी युवावस्था में यह चमड़ी के नीचे गहरे पैठते हैं.

Adolescents tend to get them around the "T-zone"of the chin ,nose and forehead, Women past their mid-twenties get more persistent spots which are deeper under the skin, 'The Daily Telegraph' reported.

औरतों में मर्दों के बरक्स तीन गुना ज्यादा संभावना बनी रहती है कील मुंहासों की क्योंकि इनकी चमड़ी मेल होरमोन के प्रति ज्यादा संवेदी होती है. माहिरों के अनुसार अब इस बात का फैसला, पुनर-मूल्यांकन हो जाना चाहिए कि कील मुंहासों की चपेट में आखिर आ कौन रहा है? एडल्ट वोमन इनकी चपेट में लगातार आ रही है. कुछ को इसका सामना थोड़ा देरी से तब करना पड़ता है जब एक ही समय पर घर बाहर परिवार और करियर के बीच तालमेल बिठाने की कला मे माहिरी क्या बाजीगरी उन्हें करनी पड़ती है.

एक दिल चस्प बात यह भी है एडल्ट एकने ज्यादा अनियमित हैं ज्यादा sporadic हैं. कभी कभार दिखलाई देतें हैं एक ही माह में माहवारी से पहले और माहवारी के दौरान ये प्रगट होतें हैं ८५% मामलों में ऐसा ही हमला हो रहा है कील मुन्हासों का युवतियों में..

एक ख़ास बात और माहिरों के अनुसार निकोटिन तैलीय सीबम के उत्पादन को बढा देती है .इसीलिए जो युवतियां धूम्रपान करतीं हैं उनमे कील मुंहासों के हमले अकसर और ज्यादा हो रहे हैं.
फैशन स्टेटमेंट, पीयर प्रेशर, और कथित आज़ादी के तहत आप फिर भी स्मोक करतीं हैं तब आपकी मर्जी, वैसे आपके लिए मौतार्माओं धूम्रपान छोड़ने की यह एक वाजिब वजह तो है ही. आज के दौर में सारा खेल लुक्स का है. सुदर्शन, सुदर्शना दिखने रहने का दौर है यह.

(Stress causing acne in successful women?/TIMES TRENDS/THE TIMES OF INDIA, MUMBAI, NOVEMBER 28, 2011, P17).

डाइटिंग के बाद पैदा हुए हारमोन बदलाव ही दोबारा से आपको मोटापे की ज़द में ले आते हैं

डाइटिंग के बाद पैदा हुए हारमोन बदलाव ही दोबारा से आपको मोटापे की ज़द में ले आते हैं फिर से आपका वजन बढ़ जाता है. ऐसे में अतिरिक्त निगरानी की ज़रुरत होती है डाइटिंग के बाद कम हुए तौल को बनाए रखने में, भूख से लड़ने के तमाम जतन सारे नुश्खे आजमाने पड़ते हैं. तमाम तरह के पापड बेलने पडतें हैं रिसर्चरों का यही कहना है.

माहिरों के अनुसार भूख से जुड़े हारमोन अपना बदला हुआ स्तर डाइटिंग के एक साल बाद तक बनाए रह सकतें हैं. जिस अनुपात में बॉडी फैट फ़ीसदी शरीर में जमा चर्बी कमतर होती है उसी के अनुरूप कुछ हारमोनों के स्तर में भी बदलाव दर्ज़ होतें हैं.

वेट लोस रिसर्च भूख शमन कारी तत्वों भूख शामक चीज़ों की तलाश करेगी देर सबेर. बात साफ़ है. तौल कम करना मुश्किल काम है लेकिन और भी मुश्किल है उस तौल माप को बनाए रखना. यही वजह है साल भर के भीतर भीतर ८० फीसद लोग डाइटिंग संपन्न कर लेने के बाद फिर से पुरानी तौल पर लौट आतें हैं.

और हाँ मात्र इच्छा शक्ति का अभाव इसकी एक अकेली वजह नहीं बनती है. न्यू इंग्लैण्ड जर्नल ऑफ़ मेडिसन में छपी एक रिसर्च के मुताबिक़ डाइटिंग जिन भूख से जुड़े हारमोनों में बदलाव ला देती है, विछिन्न कर देती है जिन हारमोनों को वह वेट लोस से पैदा हुए बिखराव तकरीबन एक साल तक वैसे ही कायम रहतें हैं. ऐसे में भूख पर काबू रखना बे-काबू हो जाता है. ला पता हो जातें हैं वह हारमोन जो पेट भरने और भूख शांत होने पर तृप्ति का एहसास करातें हैं. ऐसे में डाईटर के मंसूबे धरे के धरे रह जातें हैं.

ऐसा जैविक परिवर्तनों की वजह से होता है न की अदबदाकर खाने पीने की पुरानी आदतों पर लौट आने की वजह से. यही कहना बूझना है माहिरों का.

बरसों से वाकिफ है विज्ञानी इस तथ्य से कि हमारी अंतड़ियों,(गट), अग्नाशय (पैनक्रियाज़) तथा चर्बी के ऊतकों (फैटी तिश्युज़ )में मौजूद हारमोन ही हमारी भूख प्यास तथा ऊर्जा को जलाने केलोरियों को उड़ाने की कूवत का विनियमन करतें हैं. असरदार होता है इन हारमोनों का असर. लेकिन इसका विलोम भी उतना ही सही है. यानी शरीर में ज़मा चर्बी में आये बदलावों का प्रतिशत, जमा चर्बी में आई फीसद गिरावट भी लेप्टिन जैसे हारमोनों में आई गिरावट की वजह बनती है. ऐसे हारमोन ही दिमाग को यह इत्तला देते हैं कि बस करो भाई साहब ठूंसा ठांसी अब पेट भर गया नीयत भर गई तृप्त हो गया मन.

दूसरी तरफ वसा के फीसद में आई गिरावट Ghrelin जैसे कुछ और हारमोनों के स्तर को बढा देती है. भूख को हवा देतें हैं ये बाद वाले हारमोन. अलबत्ता इस शोध से पहले इस बात का इल्म नहीं था कि ऐसे बदलाव वेट लोस के बाद भी बने रहतें हैं .कायम रहते हैं.

इसका पता तब चला जब माहिरों ने तकरीबन पचास ऐसे औरत मर्दों को दस हफ्ते तकबहुत ही कम केलोरी वाली खुराक पर रखा जो सभी के सभी या तो ओवरवेट थे या फिर मोटापे क़ी ज़द में थे ओबेसी थे. अब इसके एक साल बाद तक इनके हारमोनों के स्तर का पता लगाते रहे.

डाइटिंग के दौरान औसतन सभी का वजन ३० पोंड कम हुआ जो उनके शुरूआती वजन का तकरीबन १०%के करीब था. ऐसे सात लोगों को अध्ययन से बहिष्कृत कर दिया गया जो इस तौल माप की इस सीमा में नहीं आ सके थे.

शेष सभी के रक्त परीक्षणों से पता चला कई हारमोनों का औसत स्तर बदल गया है जिनमे लेप्टिन, ghrelin तथा इंसुलिन भी थे. इस बदलाव की वजह तौल में आई गिरावट ही बनी थी. उम्मीद के अनुरूप यह भी पता चला नाश्ते के पहले और बाद में भी इन्हें भूख पहले से कहीं ज्यादा उग्र रूप लिए लगती थी.

दस साप्ताहिक अध्ययन के बाद सभी प्रतिभागियों को अपनी सामान्य खुराक पर लौट जाने के लिए कहा गया इस हिदायत के साथ कि रोजाना बिना नागा उन्हें आधा घंटा कसरत भी करनी हैं. खुराक के माहिरों से संपर्क भी बनाए रखना है. साल भर बीतने पर सभी का तौल १२ पोंड बढ़ गया तथा भूख बेतहाशा लगती थी. हारमोनों का स्तर भी आंशिक तौर पर ही तबदील हुआ था.

माहिरों के अनुसार हारमोनों के स्तर की आंशिक भरपाई तथा बदलाव का कायम रहना एक विकासात्मक जीवन की निरंतरता को बनाए रखने वाली रणनीति है जो युगों युगों में विकसित हुई है. खोये हुए वजन की पुनर्प्राप्ति इसी सर्वाइवल टेकटिक के तहत होती है, अनेकानेक तरकीबें कुल मिलाकर दिमाग को बत्लारी रहतीं हैं, भूख लगी है खाओ, खाना नहीं छोड़ना है जीवन की कायमी के लिए यह ज़रूरी है.

But now that we live in a world where calories are so easily consumed and physical exercise -- the best way to burn off those calories -- is largely unnecessary for day-to-day survival, these biological drives are backfiring and contributing to obesity, Burant says.

इसका मतलब यह भी नहीं है कि वेट गें अपरिहार्य है होनी ही होनी है पुराने तौल की वापसी. इसका मतलब यह भी नहीं है कि व्यक्ति के इच्छा शक्ति का कोई अर्थ नहीं है. व्यक्तित्व और मनोविज्ञान मनोजगत से चस्पां बातों का असर होता है लेकिन हारमोनों में होने वाले बदलाव असली हैं भौतिक परिघटना हैं. जिनके असल भौतक प्रभाव भी हैं. यही वजह है कुछ लोग तौल को देर तक बनाए रहतें हैं लेकिन कुछ और जल्दी ही वेट गेन कर लेते हैं. सचेतन सायास जतन करने पडतें हैं खबरदारी रखनी पड़ती है भूख का शमन करना पड़ता है कम हुई तौल को बनाए रखने में जो हरेक के बसकी बात नहीं.

रिसर्च ज़ारी है तमाम कोशिशें चल रहीं हैं कैसे हारमोनों का स्तर जल्द से जल्द वेट लोस के बाद कायम (स्थिर) रखा जाए. लेप्टिन हारमोन पुनर्स्थापन भी आजमाया गया है घटी हुई तौल को बनाए रखने में. जैसे मधुमेह ग्रस्त व्यक्ति को बाहर से इंसुलिन दी जाती है ताकि ग्लूकोज़ का मान्य स्तर बना रहे ऐसा ही कुछ तौल घटाके उस पर कायम रहने वालों के लिए भी किया जाना है. हारमोन और ओबेसिटी रिसर्च में भूख शमन कारी चीज़ों का अन्वेषण भी होता ही रहेगा.

विज्ञान संचार पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन सम्पन्न International Conference on Science Communication for Scientific Temper

अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन पर खास विज्ञान रिपोर्ट 

          
NASC काम्प्लेक्स PUSA,नयी दिल्ली 
NASC काम्प्लेक्स पूसा,नयी दिल्ली में 10 से 12 जनवरी 2012 तक चल रही अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस सम्पन्न हुई.

सी.एस.आई.आर.-निस्केयर,विज्ञान प्रसार,एन.सी.एस.टी.सी. नेटवर्क-डी,एस.टी. के संयुक्त तत्वाधान में आयोजित इस अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में देश-विदेश से आये बहुत सारे विज्ञान संचारकों, वैज्ञानिकों, शिक्षाविदों एवं सरकारी नुमाइंदों ने भाग लिया और वैज्ञानिक सोच विकसित करने में विज्ञान संचार पर अपने शोधपत्र पढ़े और महत्वपूर्ण विचार साझे किये.  

राष्ट्रीय कृषि विज्ञान काम्प्लेक्स के ए.पी.शिंदे आडिटोरियम में 10 जनवरी को सुबह 10 बजे इस  अंतर्राष्ट्रीय   कांफ्रेंस का उद्घाटन हुआ था।

उद्घाटन सत्र का दृश्य 
गौहर रज़ा जी, महेश भट्ट जी  
इस उद्घाटन सत्र  को निम्न महानुभावों ने संबोधित किया 
1. श्री गौहर रज़ा
2. श्री महेश भट्ट 
3. श्री गंगन प्रताप सिंह 
4, श्री जस्टिस मारकंडेय काटजू
5. श्री बर्नाड स्चिएले 
6. श्री बी.एम. भार्गव
7. श्री सुबोध मोहंती 
उद्घाटन सत्र  
आडिटोरियम 
श्री जस्टिस मारकंडेय काट्जू जी ने बहुत ही अच्छे तरीके से समझाया कि सही मायने में लोकतंत्र और वैज्ञानिक सोच क्या है उनके अनुसार सही मायने में आधुनिक विज्ञान ही हमें मानव समाज को और अधिक सुखी बना सकता है आपने कहा कि वैज्ञानिक ज्ञान परमाणु बम भी बना सकता है और उसी को परमाणु ऊर्जा में बदल कर मानव जीवन सुखमय भी बना सकता है आपने प्राचीन भारतीय विज्ञान के विकास पर भी प्रकाश डाला दशमलव और जीरो शून्य भारत की देन है लाख, करोड़, अरब, खरब, पदम, नील, शंख तक संख्याएँ हमारी ही देन हैं. 

नास्‍क काम्प्लेक्स पूसा, नयी दिल्ली का यह आडिटोरियम बहुत ही सुंदर बड़ा और अंतर्राष्ट्रीय सत्र का है. इसमें एक राष्ट्रीय कृषि विज्ञान संग्राहलय भी है जिस में बहुत ही ज्ञानवर्धक प्रदर्शनी और जीवंत नज़ारे हैं.  प्राचीन काल से लेकर आज तक के कृषि विकास का बड़ा ही नयनाभिराम नज़ारा है. सभी को यह राष्ट्रीय कृषि विज्ञान संग्राहलय जरूर देखना चाहिए.

समानांतर सत्र-7, ए.पी. शिंदे हाल
डा.अरविन्द मिश्रा जी ने विज्ञान गल्प : वैज्ञानिक सोच विकसित करने का एक मार्ग नामक सत्र की अध्यक्षता की, इस सत्र के वक्ता निम्न थे.
चेयरपर्सन : डा.अरविन्द मिश्रा, 
 आमंत्रित वक्ता : श्रीमती स्वाति बूटे
वक्ता:  
1. अमित सरवाल 
2. गीता बी.
3. डॉ0 जाकिर अली'रजनीश'
4. मीरअम्नाउल्ला 

5. रत्नाकर डी. भेलकर 

इस सत्र में विज्ञान गल्प से सम्बन्धित पेपर प्रस्तुत किये गए. अपने 'विज्ञान कथाओं के द्वारा बच्‍चों में वैज्ञानिक मनोवृत्ति का विकास' प्रस्‍तुतिकरण में डॉ0 जाकिर अली रजनीश ने कहा कि विज्ञान कथाएं सिर्फ बच्‍चों को विज्ञान से जोड़ने का माध्‍यम ही नहीं हैं, उनके द्वारा बच्‍चों में वैज्ञानिक ढंग से सोचने का नजरिया भी विकसित किया जा सकता है. इसके अतिरिक्‍त अन्‍य वक्‍ताओं ने भी विज्ञान कथाओं के विभिन्‍न पक्षों को लेकर अपनी बात रखी.
समानांतर सत्र -९ ट्रेनिंग हाल 

समानांतर सत्र-9 की रिपोर्टिंग,
शीर्षक: Development Communication 
चेयरपर्सन: श्री अश्विनी कुमार, आमंत्रित वक्ता: एन. रघुराम 
वक्ता:    
1. श्री दर्शन लाल 
2. श्रीमती सेमिन रुबाब 
3. श्री अजय शेओपुरी 
4. अनुराधा यादव 
5. श्रीमती नीरजा राघवन 

श्री अजय शेओपुरी जी ने CSIR-NISCAIR Tube: A novel way to communicate science के बारे ने बताया कि CSIR-NISCAIR ट्यूब,यू-ट्यूब की ही तरह से है जहां आप अपने विज्ञान सम्बंधित वीडयो अपलोड कर सकते है इनका काम विशेष रूप से सराहा गया.सभी अपने विज्ञान जागरूकता सम्बन्धित वीडियो इस टयूब पर अपलोड करे ताकि ज्यादा से ज्यादा बच्चे व बड़े भी लाभान्वित हो सकें.
 
 ब्लोगर मिलन
 यहाँ पर एक ब्लोगर मिलन का भी आयोजन किया गया इस में निम्न ब्लोगर्स मिले
१.श्री संतोष त्रिवेदी जी
२.दर्शन लाल बवेजा
३.डा. अरविन्द मिश्रा जी
४.श्री अविनाश वाचस्पति जी  
५.डा.जाकिर अली 'रजनीश' जी 
                           
समापन सत्र  Valedictory Session






    श्री सुबोध मोहंती  
और इस प्रकार समापन हुआ इस वैज्ञानिक सोच के लिए विज्ञान संचार पर अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन का दिनांक 12.01.2012 को. 

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भू-विज्ञान के संस्थापक पुरुषों में एक - निकोलस स्टेनो (जन्मदिन पर विशेष )



11 जनवरी जब गूगल ने भी सम्मान दिया उन निकोलस स्टेनो को उनकी 374 वें जन्मदिन पर याद करके, जिन्हें 'Father of Geology &  Stratigraphy ' (भू-विज्ञान व भू-स्तरिकी) के नाम से याद किया जाता है. 11  जनवरी 1938 को कोपेनहेगन में जन्मे निकोलस ने किशोरावस्था में ही निश्चय कर लिया था कि वो मात्र पुस्तकों में लिखे शब्दों पर नहीं बल्कि अपने शोध व अनुभवों से अर्जित ज्ञान पर ही विश्वास करेंगे. स्वर्जित ज्ञान की यह पिपासा ही उन्हें चिकित्सा विज्ञान पर महत्वपूर्ण पड़ावों से गुजरते हुए भू-विज्ञान की ओर ले गई.    


युवावस्था से ही वो भ्रमणशील रहे. इस क्रम में उन्हें कई प्रसिद्ध वैज्ञानिकों और चिकित्सकों के संपर्क में आने का अवसर मिला, जिनसे उन्हें अपनी वैज्ञानिक खोजों के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण विकसित करने में भी काफी सहायता मिली. 


संयोगवश एक शार्क के धड़ का अध्ययन करते हुए उन्होंने पाया कि उसके दांतों की साम्यता कुछ ऐसे 'पथरीले' अवयवों से है जो कुछ चट्टानी संरचनाओं में पाए गए थे. अब तक ऐसे अवशेष आसमान या चाँद से आये हुए माने जाते थे. कुछ अन्य मतों में इन्हें चट्टानों में प्राकृतिक रूप से विकसित ही माना जाता था. निकोलस ने यहाँ से एक नए सिद्धांत की बुनियाद रखी कि पदार्थ अपने बाह्य स्वरूप को अक्षुण  रखते हुए भी आतंरिक रासायनिक संरचना में परिवर्तित हो सकते हैं. यहीं से उनकी एक नई खोज भी शुरू हुई कि किस प्रकार कोई ठोस पदार्थ किसी अन्य ठोस या चट्टान के अन्दर पाया जा रहा है !!! उनकी यह खोज न सिर्फ जीवाश्म बल्कि खनिज, क्रिस्टल्स, Rock Veins आदि कई क्षेत्रों के लिए अहम् सिद्ध हुई. इस दिशा में उनके शोधों ने भू-विज्ञान के कुछ बुनियादी सिद्धांतों की नींव रखी जो ' Law of Superposition ', 'Principal of Original Horizontality '  और 'The Principal of Lateral Continuity' के रूप में विख्यात हैं. निकोलस के ये सिद्धांत भू-विज्ञान और भू-स्तरिकी के आगामी कई सिद्धांतों के विकास की भी आधारशीला बने. 

भू-विज्ञान की एक शाखा 'क्रिस्टलोग्राफी' में तो एक 'Steno Law ' ही है जो क्रिस्टल्स के कोणों पर आधारित है. 

विज्ञान से ज्यादा गहरे से जुड़ा व्यक्ति आध्यात्म से भी दूर नहीं रह सकता. निकोलस के व्यक्तित्व में भी इसकी झलक दिखाई पड़ी और वो कैथोलिक मत से जुड़ते हुए बिशप भी रहे. 1686 में उनके निधन के बाद उन्हें संत की श्रेणी में लाने की भी कवायद शुरू हुई, और 1988 में उन्हें 'बिटस' की उपाधि भी दी गई. 

उनकी स्मृति में किये गए कई आयोजनों में डेनमार्क में एक म्यूजियम की स्थापना. मंगल और चन्द्रमा पर दो क्रेटर्स  का नामकरण उनके नाम पर किया जाना आदि प्रमुख हैं. चिकित्सा तथा भू-विज्ञान जगत उनके योगदानों के लिए सदा ऋणी रहेगा.  

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...अब नहीं चलेगी ऑफिस टाइम में चैटिंग और फेसबुकबाजी !





वो सभी ऑफिस कर्मचारी ध्यान दे जो ऑफिस में नेट सर्फिंग करते है, अगर वो सोशल नेटवर्किंग साईट जैसे फेसबुक, ऑरकुट या फिर चैटिंग में अपना टाइम पास करते हैं या ऑनलाइन गेम खेलते हैं. अगर वो वास्तव में ऐसा कर करते है तो अपनी इस आदत को दूर करने की कोशिश करें. वरना बहुत जल्द ही आपके बॉस की डाट आप पर पड़ने वाली है. क्योंकि ऐसा सोफ्टवेयर आ रहा है जो गुप्तचर कि तरह काम करेगा, और आपकी सारी क्रियाकलापों पर ध्यान रखकर बॉस को सूचित करेगा. अब इसको अभी डीप सोफ्टवेयर कंपनी ने बनाया है. खासकर वो कर्मचारी जो कि आई टी कंपनी में वर्क करते है या कॉल सेण्टर में जॉब करते है. यह सॉफ्टवेयर ई-मेल, फोन कॉल, और विडियो कांफ्रेंसिंग के दौरान आपके हाव-भाव पर नजर रखेगा. (जैसे चित्रों में दिखाया गया है)

हालांकि सभी कर्मचारी इसका विरोध करना चाहेंगे मगर क्योंकि आपको अपनी इस आदत को दूर करना ही होगा. माइक्रोसॉफ्ट ने भी ऐसे सॉफ्टवेयर को पेश करने का इरादा करते हुए पेटेंट के लिए आवेदन कर दिया है खबर तो यहाँ तक है कि यह सोफ्टवेयर कमर्चारियो पर निगाह रखकर उन्हें उनके क्रिया कलापों के अनुसार पॉजिटिव व निगेटिव मार्क्‍स देगा, जिसका असर कंपनी में आपके प्रोमोसन और सलारी इन्क्रीमेंट पर भी पद सकता है. 

इस सोफ्टवेयर क़ा नाम एक्टिविटी मोनिटर दिया गया है, लेकिन इसके बहुत फायदे है जैसे कि इसके जरिए कोई संस्थान न सिर्फ गुप्त जानकारियों को लीक होने से रोकता है, बल्कि ग्राहकों द्वारा उपलब्ध कराई गई जानकारियों और ट्रेड सीक्रेट्स को भी बचाए रखता है जैसे कि कुछ संस्थानों में इस सिस्टम से अधिकारियों या सहयोगी कर्मचारियों द्वारा उत्पीड़न को भी रोकने में मदद मिलती है, साथ ही साथ इसके द्वारा गलत तरीके से किसी डाटा या सॉफ्टवेयर की डॉउनलोडिंग को भी रोका जा सकता है. ये टी एक्टिविटी मॉनीटरकर्मचारियों द्वारा विजिट की गई वेबसाइट्स के लॉग पर निगाह रखता है यानी अगर कोई कर्मचारी काम के समय में ऑनलाइन गेम खेलता है, वीडियो देखता है या सोशल नेटवर्किग साइट्स का उपयोग करता है, तो उसकी जानकारी भी ये रखेगा, इस तकनीक से ऑफिस के काम के दौरान जो लोग फ़ालतू के काम समय बर्बाद करते है अब उनको आसानी से कण्ट्रोल किया जा सकेगा और वो झूठ भी नहीं बोल पायेंगे.

मजे कि बात तो ये है कि इस तकनीक में कुछ ऐसे मोड्यूल भी है जिनकी मदद से व्यक्तिगत आईडी से भेजी गई ई-मेल के टेक्सट को भी कैप्चर कर सकते हैं, और किसी ने चैटिंग में क्या-क्या बात कीं उस रहस्य क़ा पाता भी लगाया जा सकता है, इस तरह ऑफिस में आप हमेशा एक जेल में बंद रहेंगे. ये सिस्टम एक ही समय में सभी कंप्यूटरों पर न सिर्फ नजर नज़र रखने के साथ ही साथ उनके ऑपरेशन को भी कण्ट्रोल कर सकता है जैसे कि एक्टिविटी मॉनीटर नेटवर्क कंट्रोलर और मैं इन्चार्गे को यह परमीसन देता है कि वह नियंत्रण कक्ष से किसी भी कंप्यूटर को शट डॉउन या सिस्टम को रिबूट कर सकता है, कर्मचारी द्वारा किए जा रहे किसी फालतू के काम को बीच में भी रोका जा सकता है.

अगर देखा जाये तो ये सोफ्टवेयर काफी हद तक किसी भी संस्था की कार्य विय्वस्था को सुधारने में काफी हद तक सहायक है. जिसका असर सीधे संस्था की गुणवत्ता पर भी पड़ेगा. परा यहाँ मै ये भी कहना चाहूँगा की कुछ संस्थान अपने कर्मचारियों क़ा सही से काम करने के बाद भी उनका शोषण करते है जो की गलत है जैसे की जब मन चाहे वो कर्मचारियों को निकाल देते है, कभी कभी तो संस्था अपने फायदे के लिए अपने ही कर्मचारियों से फर्जी काम भी करवाते है जिससे टैक्स कम देना पड़े या फिर चेकिंग के दौरान पकडे ना जाये. सत्यम सोफ्टवेयर कंपनी क़ा घोटाला इसका एक बड़ा उदहरण है. और भी अनेक इंजीनियरिंग कालिजो में बहुत फर्जीवाड़ा चलता है जैसे की जायदा टीचर दिखाना रिकॉर्ड में, उनकी सेलरी नियम के अनुसार दिखाना पर उतनी देते नहीं है. और ना ही उतने अध्यापक होते है उनके पास और ना ही लैब और वो फिर भी ऍ.आई.सी.टी. की चेकिंग में पकडे नहीं जाते. उन सब क़ा क्या? क्या ये सब सही है?

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अस्वीकरण: यहाँ प्रकाशित सभी लेख उनके लेखकों के व्यक्तिगत मत हैं। मात्र वैज्ञानिक सोच/चेतना प्रसार के किए इसका संचालन किया जा रहा है। सभी विवादों का न्याय क्षेत्र लखनऊ रहेगा।