जिम में घंटों बिताने के बनिस्बत तीन मिनट की गहन तीव्रता वाली कसरत काफी है ?


 
जिम में घंटों व्यायाम करते रहने वर्क आउट्स में समय बिताने से बेहतर क्या आज की तेज़ रफ़्तार ज़िन्दगी के अनुरूप सिर्फ तीन मिनिट का ज़ोरदार (व्यक्ति विशेष की अधिकतम क्षमता के साथ किया गया व्यायाम) अतिरिक्त चर्बी को ठिकाने लगाने के लिए ज्यादा कारगर है?

(British researchers claim that the secret to staying slim is short bursts of intense exercise -known as high intensity interval training (HIT).' and as such a session once a week is far more effective at burning fat than slogging away for hours in gym.

साइंसदानों  के  मुताबिक़ HIT वसा को जलाने वाले हारमोनों का स्रावी तंत्र से स्राव करवाता है. इतना ही नहीं यह खून में घुली शक्कर (glucose) को निकालकर पेशीय ऊतकों तक पहुंचाता है जहां यह ग्लूकोज़ ऊर्जा के रूप में जल खप जाता है.

अलावा इसके अधिकाधिक तीव्रता का अल्पकालिक ज़ोरदार व्यायाम भूख का शमन करता है. जबकि देर तक किया गया व्यायाम क्षुधा वर्धक साबित होता है. इसका मतलब यह हुआ जिम में देर तक व्यायाम करते रहने के बरक्स तीव्रता लिए अल्पकालिक तेज़ कदमी ज्यादा लाभदायक है शरीर से अवांछित चर्बी उतारने में. अनहेल्दी ट्रीट्स, दावत के प्रलोभन से भी ऐसा करने वाले बचे रहेंगें बरक्स उनके जो देर तक पसीना निकालते हैं मानव चक्की पर इतर मशीनों उपकरणों पर. जब आदमी पैदा हुआ था ये मशीनें नहीं थीं.

बिर्मिन्ग्हम और नॉटिंघम यूनिवर्सिटी के रिसर्चरों का यही कहना बूझना है. तीव्र व्यायाम पेशियों द्वारा ग्लूकोज़ की खपत को बढाने में विधाई भूमिका निभाता है. और ऐसा देखते ही देखते होने लगता है यही कहना है इस शोध के अगुवा का.

तेज़ रफ़्तार व्यायाम से आप ऐसे हारमोनों का स्राव करतें हैं जो चर्बी सरलीकृत रूपों में फ़टाफ़ट तोड़ने लगतें हैं. व्यायाम के बाद भी यह चर्बी टूटती रहती है सरलीकृत रूपों में. इन्द्युरेंस एक्सरसाइज़ के बरक्स माहिरों ने इस विधि को कहीं कारगर बतलाया है. वक्त की तंगी के इस दौर में इससे बढ़िया और क्या बात हो सकती है. भगवान् करे माहिरों का कहना सच साबित हो. कल कोई इसे गलत साबित न कर दे.

Just three minutes of exercise a week is key to fitness/TIMES OF INDIA, MUMBAI/FEB 22, 2012. P17.

छह जून को शुक्र पारगमन The Transit of Venus 06 June 2012

छह जून को शुक्र पारगमन The Transit of Venus 06 June 2012
अपने परिक्रमा पथ पर सूर्य की परिक्रमा करते हुए जब सूर्य और पृथ्वी के बीच के ग्रह सूर्य और पृथ्वी की सीध में आते हैं तब इस घटना को पारगमन कहा जाता है। सूर्य और पृथ्वी के बीच शुक्र ग्रह के सीध में आने की घटना को शुक्र पारगमन कहा जाता है और बुध के सीध में आने की घटना को बुध पारगमन।
जब चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच में आ जाता है तब सूर्य ग्रहण होता है। जब बुध या शुक्र सूर्य और पृथ्वी के बीच आ जाता है तो उसे पारगमन कहा जाता है। चूंकि बुध और शुक्र ग्रह पृथ्वी से काफी दूर स्थित हैं इसलिए वे पारगमन के दौरान एक छोटा काला धब्बा बनाते हैं जो सूर्य की तीव्र प्रकाशित डिस्क पार करने के लिए कई घंटे लेता है। 
छह जून 2012 को सुबह 5 बजे से 9 बजकर 52 मिनट तक सूर्य के भीतर शुक्र गृह की चाल देखी जाएगी। इस सदी की यह आखिरी शुक्र पारगमन की घटना होगी। लेकिन 2004 की तरह इस पारगमन के पूरे घटनाक्रम को हम यहाँ भारत में नहीं देख सकेगें क्यूंकि जब भारत में सूर्योदय होगा तो शुक्र पारगमन शुरू हो चुका होगा इसके बाद यह खगोलीय घटना 105 साल बाद देखी जा सकेगी। 
शुक्र की तरह बुध ग्रह का भी पारगमन होता है बुध पारगमन पृथ्वी से एक सदी में 13-14 बार देखा जा सकता है परन्तु शुक्र पारगमन ग्रहों की व्यवस्था के कारण दुर्लभ घटना है यह 243 वर्षों में केवल 4 बार ही होती है   इस 243 वर्षों के काल में शुक्र पारगमन की घटना युग्म वर्षों में होती है जैसे दो लगातार पारगमन 8 वर्ष के अंतराल पर होते हैं और बाकी के दो एक शताब्दी से भी अधिक के अंतराल पर।  

छह जून 2012 वाला शुक्र पारगमन 2004   के बाद 8 वर्ष वाला है और 2012 के बाद  उक्त घटना के लिए   105 साल का इंतजार  करना होगा
वर्तमान पीढ़ी के लिए यह आखरी शुक्र पारगमन होगा।
कि इस घटना के वक्त पृथ्वी से देखने पर शुक्र सूर्य के सामने से धीमी रफ्तार में क्रिकेट की गेंद के आकार में गुजरता दिखाई देगा। 
शुक्र पारगमन की घटना करीब छह घंटे तक चलेगी और यह नजारा पूरे भारत में देखा जा सकेगा।
इसके पूर्व 08 जून 2004 को शुक्र पारगमन हुआ था और इसके बाद इस वर्ष छह जून को होगा।
अप्रेल 2012 महीने   खत्म होने के बाद मई महीने के अंत तक शुक्र सूर्योन्मुखी हो जाएगा और सूर्य की ओर चलने लगेगा। इस बार शुक्र जब सूर्य के निकट पहुंचेगा तब एक अद्भूत खगोलीय घटना घटेगी। दरअसल, 6 जून को जब सूर्योदय होगा तब शुक्र सूर्य के ठीक सामने से गुजर रहा होगा। यह घटना शुक्र का पारगमन अथवा संक्रमण कहलाती है। इसके बाद ऎसी घटना अगली बार 105 साल बाद यानी वर्ष दिसम्बर 2117 में फिर दिसम्बर 2125 में ही देखने को मिलेगी। 
शुक्र ग्रह पिछले कई दिनों से हर रोज ज्यादा चमकीला होते हुए आसमान में उठता जा रहा है। इस माह के अन्त में वह तेजी से सूर्य की ओर बढ़ेगा और शुक्र ग्रह सूर्य के सामने से गुजरेगा। 
सूर्य की डिस्क के सामने से शुक्र का पारगमन ग्रहीय पंक्तिबद्धता की दुर्लभ घटनाओं में से एक है और यह घटना अति महत्वपूर्ण भी है। 
दूरबीन के आविष्कार के बाद से सन 
1631, 1639, 1761, 1769, 1874, 1882 में केवल छह बार शुक्र पारगमन घटित हुआ है। 
 1761, 1874 और 2004  का शुक्र का पारगमन भारत में पूरे प्रवेशकाल से देखे गए हैं जबकि  छह जून 2012 के शुक्र पारगमन में  प्रवेशकाल जा चुका होगा  
शुक्र का पारगमन की आवृति में इतना बड़ा कालान्तर क्यूँ होता है ? शुक्र का पारगमन की घटना की आवृति में इतना बड़ा अंतर पृथ्वी और शुक्र के कक्षीय तलो में अंतर के कारण होता है शुक्र, पृथ्वी और सूर्य यदि एक समान तल में होते तो शुक्र पारगमन की घटना ज्यादा आवृति में होती। शुक्र और पृथ्वी के कक्षीय तालो में 3.4 अंश का झुकाव होता है इसलिए जब शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच से होकर गुजरता है सूर्य से थोड़ा उपर या नीचे होता है और सूर्य की तीव्र चमक के कारण दिख नहीं पाता। जब कभी शुक्र, पृथ्वी और सूर्य के बीच नोड्स से गुजरता है और ये तीनो एक सरल रेखा पर स्तिथ  हो तो पारगमन दिखाई देता है नोड्स वे बिंदु होते हैं जहां शुक्र की कक्षा पृथ्वी के दीर्घवृत्तीय कक्षीय तल को काटती है ये नोड्स दो प्रकार के होते हैं आरोही और अवरोही 
शुक्र का सूर्य परिक्रमा काल 225 दिन का और पृथ्वी का  सूर्य परिक्रमा काल 365 दिन का होता है अर्थात दोनों का परिक्रमा काल एक सा ना होने के कारण दोनों एक साथ नोड से होकर नहीं गुजरती
कहाँ कहाँ दिखेगा छह जून 2012 वाला  शुक्र पारगमन व

 सौर फिल्टर

सूर्य का अवलोकन कैसे करें और कैसे ना करें  सूर्य का अवलोकन सुरक्षित फिल्टर या परोक्ष प्रक्षेपण पद्धति द्वारा किया जा सकता है। इस खगोलीय घटना को देखने के लिए केवल वैज्ञानिक रूप से जांचे गए सौर फिल्टर का इस्तेमाल करके ही सूर्य की ओर देखना चाहिए। सुरक्षित सौर फिल्टर के बिना खुली आंखों से पारगमन की किसी भी कला को देखने का प्रयास नहीं करना चाहिए। 
दूरबीन से सीधे कभी नहीं देखना चाहिए। धुएंदार शीशों , रंगीन फिल्मों , धूप के चश्मों , न्यूटल पोलराइजिंग फिल्टरों का भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। ये सभी असुरक्षित हैं। 
शुक्र पारगमन की घटना को देखने के लिए श्याम पोलिमर फिल्म से बने फिल्टर भारत में कईं विज्ञान संस्थाएं उपलब्ध करवायेंगी। 
अवलोकन के दौरान सावधानियां इस अद्भुत नजारे को देखने से पूर्व जांच कर लेनी चाहिए कि फिल्म को कोई क्षति तो नहीं हुई है। बच्चों द्वारा इसका प्रयोग बड़ों के निरीक्षण में किया जाए। एक बार में इसका प्रयोग रुक-रुककर कुछ सेकण्डों के लिए ही करना चाहिए। आंखों की शल्य चिकित्सा या आंखों की बीमारी होने पर इसका प्रयोग न करने की सलाह दी गई है।
Image Credit: www.exploratorium.edu 
छह जून 2012 को कहाँ कहाँ दिखेगा शुक्र पारगमन रूस, मंगोलिया, चीन, जापान, कोरिया, वियतनाम, अलास्का, न्यूजीलैण्ड, आस्ट्रेलिया, इंडोनेशिया, बर्मा, मलेशिया, भारत समेत अन्य पश्चिमी एशिया के देशो में दिखेगा 
भारत समेत अन्य पश्चिमी एशिया के देशो में पारगमन का सम्पर्क 1 व 2 सूर्योदय से पहले हो चुका होगा  परन्तु महत्तम  दशा और पारगमन का सम्पर्क 3 व 4  देखे जा सकेंगे
भारत दिल्ली में शुक्र पारगमन समय
शुक्र पारगमन 6 जून 2012 की समय सारणी 
इस बार शुक्र ग्रह पारगमन का पथ भारत में हॉकी स्टिक जैसा बनेगा। शुक्र पारगमन समस्त भारत में तब शुरू हो चुका होगा जब सूर्योदय नहीं हुआ होगा। शुक्र पारगमन की पांच अवस्थाएं होती है जो शुक्र ग्रह के सूर्य पर पथ के अनुरूप होती हैं। सूर्योदय से पहले दो अवस्थाएं जा चुकी होंगी। जब सूर्योदय होगा तब शेष तीन पारगमन अवस्थाएं हम देख सकेंगे। इन पांच में से अवस्थाओं को पारगमन सम्पर्क कहते हैं और बीच की अवस्था को महत्तम पारगमन कहते हैं।
लगभग सारे देश के लिए शुक्र पारगमन 6 जून 2012 की समय सारणी इस प्रकार है। सम्पर्क एक यानी बाह्य अन्तः प्रवेश प्रातः 03:39:20 बजे, सम्पर्क दो यानी आंतरिक अन्तः प्रवेश प्रातः 03:57:08 बजे, सूर्योदय प्रातः05:19:43 बजे, महत्तम पारगमन अवस्था प्रातः 07:00:55 बजे, सम्पर्क तीन यानी आंतरिक निर्गमन प्रातः 10:05:10 बजे, सम्पर्क चार यानी बाह्य निर्गमन प्रातः 10:22:30 बजे होगा।
दर्शन लाल (मैं) विज्ञान अध्यापक ने बताया कि हम सूर्योदय से लेकर सम्पर्क चार सम्पर्क चार यानी बाह्य निर्गमन प्रातः 10:22:30 बजे तक शुक्र पारगमन अवलोकन का आनंद उठा सकते हैं। यह अवलोकन कुल पारगमन का 57% होगा और पारगमन का पथ हॉकी स्टिक की तरह होगा। अगर हम इस दुर्लभ खगोलीय घटना को इस बार चूक गए तो अगला शुक्र पारगमन 11 दिसंबर 2117 में होगा। कोई भी वर्तमान व्यक्ति अपने जीवन में 2117 का शुक्र पारगमन नहीं देख सकता।
उन्होंने बताया कि किसी भी अवस्था में सूर्य को सीधे नहीं देखना है नहीं तो आँखों को भारी क्षति पहुँच सकती है। केवल सौर डिस्क का प्रक्षिप्त बिम्ब देंखे। दूरबीन/बाइनाक्यूलर और पिनहॉल कैमरा से सूर्य के बिम्ब का प्रेक्षेपण पिन होल, दूरबीन या बाइनाक्यूलर की एक जोड़ी द्वारा एक छायादार दीवार पर सूर्य के प्रतिबिम्ब को प्रेक्षिपित करें। केवल वैज्ञानिक रूप से जांचे गये सौर फिल्टर का इस्तेमाल करक ही सूर्य की ओर देखना चाहिए।
यदि कोई पाठक अपने शहर का समयसारणी चित्र प्राप्त करना चाहता हो तो कृपया टिप्पणी में या मेल से पूछ सकता है उनको चित्र जेनेरेट कर के भेज दिया जाएगा 
अमर  उजाला अखबार ने इस खबर को छापा 
 प्रशिक्षण  शुरू ....
दर्शन बवेजा,विज्ञान अध्यापक,यमुना नगर,हरियाणा  

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सावधान! स्तन पान से भी पहुँचती है शिशु तक कैफीन.



क्या आपका शिशु रात को सो नहीं पा रहा है? नींद के लिए तरस रहा है? यदि ऐसा है तो कोफी का सेवन कम कर दीजिए बेहतर हो मुल्तवी कर दें. रिसर्चरों ने पता लगाया है स्तन पान के ज़रिये भी शिशु तक केफीन पहुंचता है. माँ के दूध में यह पैठ बना लेता है.

न्यूयोर्क के रोचेस्टर यूनिवर्सिटी की एक टीम के अनुसार स्तन पान करवाने वाली माताओं का बराबर चाय कोफी और सोफ्ट ड्रिंक्स (सोडा, कोला पेय आदि पीना) यहाँ तक की चोकलेट का सेवन इनके खून में उद्दीपक (STIMULANT), उत्तेजक नशीले पदार्थ का स्तर बढ़ा देता है. ऐसे में 'स्तन-पानी' शिशु उत्तेजित हो, बेचैनी महसूस कर सकतें हैं. चिडचिडे हो सकतें हैं उनींदे हो सकतें हैं नींद के लिए छटपटाते रह सकतें हैं क्योंकि स्तन पान के ज़रिये यह उद्दीपक उन तक पहुँचने लगता है.

जीवन के खासतौर पर पहले पखवाड़े (पहले दो हफ़्तों) में इनके लिए इसकी गिरिफ्त से बाहर आना शरीर से इसकी निकासी कर पाना नामुमकिन हो जाता है. ऐसे में इसका  जमा होते चले जाना, सांद्रण, एकत्रण बद से बदतर लक्षण पैदा कर सकता है.

सन्दर्भ सामग्री :Breastfeeding transfers caffeine to child: Study/THE TIMES OF INDIA, MUMABI, FEB 23, 2012 P17.

एलियंस के रहस्‍य (Alien's Suspense)

"अरे ललुआ कुछ सुनत रहो कि नाय?
क्या भयो चाचा ? काहे इतने उत्सुक हो रहे हो?
अरे लल्लूलाल अभी कुछ देर पहले हम पढ़ रहे थे कि वैज्ञानिको ने दावा किया है कि  ई संसार में एलियंस भी होवत है"
चाचा एलियन  होवत है कि नाय इ तो हम नहीं कह सकत मगर हम तो वो दिन क़ा इंतजार कर रहे है कि अगर कभी हमको ससुरा एलियन मिल जाये तो अपने घर क़ा सारा काम काज हम उसी से ही करवाएंगे. मगर चाचा वैज्ञानिको कि इस रिसर्च क़ा दावा कही उल्टा या दुनिया के लिए भारी ना पड़ जाये ! "

क्या होते है एलियंस? 

इस ब्रह्माण्ड  में जो दुसरे गृह है उन गृह के प्राणियों को एलियंस कहा ज़ाता है. हालांकि ये अपने आप में खुद एक सवाल है कि क्या दुसरे गृह पर भी प्राणी होते है. लेकिन इसको लेकर भिन्न भिन्न लोगों के  भिन्न भिन्न  मत है. कुछ कहते है कि एलियंस होते है जबकि कुछ कहते है कि एलियंस नहीं होते है. कितना रोचक है ये विषय. एलियंस क़ा अध्ययन तो क्या इस अध्ययन से जुड़ना नहीं चाहेंगे? तो चलिए आइये  देखते हैं एलिएंस कि रिसर्च से जुडी कुछ खबरों को- 

अभी हाल ही में अमेरिकी अनुसंधान संस्थान के एक  वैज्ञानिक ने ये दावा किया है कि एलियंस होते हैं. असल में उन्हें एलियंस से सम्बंधित रिसर्च में कहा है कि एलियंस एक तरह क़ा बक्टीरिया क़ा जीवाश्म है जो कई वर्षो पूर्व अन्तरिक्ष से प्रथ्वी पर गिरे उल्कापिंडो  में पाया गया था. 

नासा के मार्शल स्पेस फ्लाईट  सेंटर के वैज्ञानिक डॉक्टर "रिचर्ड हूवर" ने इस दुनिया में पाए गये उल्कापिंडो पर एक शोध कार्य किया, जिसमें उन्होंने पाया कि एलियंस होते हैं. उन्होंने ये दावा "साइबेरिया और आलास्का" में पाए गये उल्कापिंडो के असाधारण नमूनों पर शोध कार्य करने के बाद किये जिससे कहीं ना कहीं ये सिद्ध होता है कि प्रथ्वी से परे भी जीवन है. 

एलियंस के अस्तित्व की धारणा को और मजबूत बनाने के लिए अब वैज्ञानिको ने इस खोज को और सरल बनाने के लिए आम आदमी को इससे जोड़ने की पहल की है. जिसमें आम आदमी एलियंस के बारे में अपने विचार, अपनी जिन्दगी में घटी कुछ अजीब और असामान्य घटनाओं के बारे इस शोध से जुड़े वैज्ञानिको को बाते सकते है.  इसलिए एलियंस कि खोज के लिए वैज्ञानिको ने एक वेबसाइट को लॉंच किया है जिसका एड्रेस है www.setilive.org अमेरिका के शहर लॉस एंजेल्स में TED (टेक्नोलोजी, इंटरटेनमेंट और डिज़ाइन) कॉंफ़्रेंस के दौरान इस वेबसाइट लॉंच किया गया है. वैज्ञानिको SETI वर्ड क़ा प्रयोग किया है जिसकी मतलब है "सर्च फॉर एक्सट्रा टेरेस्ट्रियल इंटेलिजेंस". ये वेबसाइट सेटी एलेन टेलिस्कोप के द्वारा संचारित रेडियो तरंगों को सीधे प्रसारित करेगी और जो भी लोग .इसमें भाग लेंगे उनको कहा जाएगा कि कहा जाएगा कि अगर उन्हें कोई भी असामान्य गतिविधि दिखाई दे तो वे फ़ौरन इसकी जानकारी वैज्ञानिको को दे. इस बारे में वैज्ञानिको क़ा ये मानना है कि कभी कभी इंसानों का दिमाग़ उन चीज़ो को भी देख सकता है जो कि शायद कोई स्वचालित मशीन भी नहीं देख पाए. 

जिलियन टार्टर इस योजना की प्रमुख कार्यकर्ता हैं डॉक्टर जिलियन टार्टर को 2009 में TED एवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है. डॉक्टर टार्टर के बारे में बताया ज़ाता है कि उन्होने अपना पूरा करियर एलियन की खोज में लगा दिया है और उनका कहना है कि इस वेबसाइट के लॉच होने से एलियन की खोज में जुटे वैज्ञानिकों और दूसरे विशेषज्ञों को एक साथ आने का मौक़ा मिलेगा और साथ ही साथ आम आदमी के विचारों को जाने क़ा भी मौका मिलेगा जिसे एलियंस रिसर्च को और भी सरल बनाया जा सकेगा. क्योंकि उनका ये मानना है कि जायदा से जायदा वैग्यांकियो और व्यक्तियों के इस रीसर्च से जुड़ने पर उन तरंगों का अध्ययन  करना आसान हो जाएगा जिन पर अब तक ध्यान नहीं गया. इस अध्ययन से कुछ ना कुछ तो एलियंस के बारे में जरूर नया मिलेगा. अब आगे देखते है कि कहा तक जाती है एलियनस के बारे में ये खोज. 


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क्यों और कैसे हो जाता है कोई ट्रांस -जेंडर? (Transgender Man & Women )


Jenna Talackova
Jenna Talackova : Transgender beauty queen

Dr Kalpesh Gajiwala, caught in the middle of the controversy surrounding Bidhan Barua's sex-change operation, writes exclusively for Mumbai Mirror.

Bidhan doc's plea: Don't demonise boy or his parents.

A true success story is not when a transformed transgender is paraded as a trophy, but when social integration is seamless/Mumbai Mirror, Lead story, Cover Page/May 12, 2012

भारतीय विद्या भवन के संस्थापक एवं सविधान सभा के सम्मानीय सदस्य KM Munshi साहब  ने अपनी मशहूर कृति 'कृष्णावतार' में एक पाठ का शीषक रखा था 'The boy who was a girl' (लड़का जो लडकी था). इस पाठ में आप ने उस कौशल और  बड़े हुनर का ज़िक्र किया है जिसका इस्तेमाल करके कृष्ण राजकुमारी शिखंडी के मनो-भौतिक शरीर को पुरुष काया स्वीकार करवाते हैं.

बेशक बाद में कृष्ण अपनी इसी सृष्टि का रणनीतिक इस्तेमाल महाभारत युद्ध में अर्जुन का सारथी बन कूटनीतिक  तौर  पर  करते  हैं. शिखंडी एक ट्रांस-जेंडर था और तत्कालीन युद्ध के अनुसार केवल पुरुष ही युद्ध में शरीक हो सकते थे, शिखंडी नहीं. न ही उस पर कोई अश्त्र शश्त्र चला सकता था. लक्ष्य भेदी तीर दाग सकता था. 

यहाँ  इस उद्धरण को देने का मतलब सिर्फ इतना ही है कि हमारे कायिक शरीर में विपरीत लैंगिक एक मनो-शरीर का होना कोई नई बात नहीं है और न ही बिधान बरुआ वर्तमान दशक का पहला ट्रांस-सेक्सुअल है. प्रकृति की लीला कह लो या कोशा विभाजन में होने वाली चूक वह भी शुक्र और अंडाणु के मिलन मनाने के बाद, यानी निषेचन के बाद यह चूक अनेक रूपों में प्रगटित, रूपायित होती रही है. कभी किसी महिला को कोई छंगा (छ: उँगलियों वाला) नवजात पैदा होता है. कभी कुछ और विकृति स्वरूपा बालक.

एकल निषेचित ह्यूमेन एग निषेचित अंडाणु से ही यह सृष्टि खड़ी हुई है. जो अभी नहीं जन्मा है वह बीज रूप पड़ा हुआ है. सारा कमाल और कौशल और अपवाद उस सिंगिल फ़र्टिलाइज़्ड एग का है जिससे पहले भ्रूण (पश्चिमी सोच के तहत पहले पखवाड़े तक एम्ब्रियो बाद के कोशिका विभाजन के बाद निषेचित अंडाणु फीटस कहलाता है) हमारे यहाँ पौर्बत्य दर्शन में एक ही शब्द प्रयोग भ्रूण प्रचलित है.

विभेदीकरण (Differentiation) से पहले जब कोशिका विभाजन निषेचन के बाद चंद कदम ही आगे रख पाता सभी कोशाये एक समान, यकसां होती हैं. विभेदन के बाद सबका रोल अलग अलग हो जाता है. सब के पास एक सोफ्टवेयर होता है कौन आगे चलके क्या करेगा. कौन सिर बनाएगा भ्रूण का, कौन धड, हाथ पैर कौन बनाएगा, नाखून और चरम कौन? विभेदन से पहले की कोशिकाएं ही जादुई स्टेम सेल्स कहलातीं हैं, जिन्हें सोफ्ट वेयर देकर आप कोई भी अंग शरीर का चुनिन्दा तौर पर तैयार करवा सकते हो.

भ्रूण का विकसित होना एक जटिल प्रक्रिया है यहाँ अनेक पेचीदा श्रृंखलाबद्ध क्रियाएं संपन्न होती हैं. कितनी ही एक ही समय पर संपन्न होतीं हैं कितनी ही क्रमवार. बस ज़रा सी चूक होने की देर है. नतीजा होता है 'ब्‍लू बेबी' (Blue Baby- ऐसा बच्चा जिसके दिल में जन्मना सूराख होता है), या फिर Cleft lip लिए चला आता है नवजात तो कभी आत्मविमोही बना (Autistic, Autism से ग्रस्त). तो कभी ऐसा जन्मना रोग लिए चला आता है जिसमे न पढ़ पाता है न लिख पाता है (Dyslexia).


व्यक्ति का ट्रांस-जेनडर होना भी इसी कोशिका विभाजन के तहत चलने वाली प्रक्रियाओं में किसी स्तर पर हुई चूक की ही परिणिति है.

जहां नवजात का अतिरिक्त अंग लिए चले आना स्वीकृत है चाहे वह मामला छ: उँगलियों का हो या दो अगूंठों का या cleft lip का. माँ बाप इन मामलों में सहर्ष इलाज़ भी जल्दी से जल्दी  करवाते हैं. और अब तो प्लास्टिक सर्जरी मयस्सर है विकृत अंग सुधार के लिए चाहे, वह  क्लेफ्ट लिप का मामला हो या कोई और विकृति.

(Cleft lip is a condition in which one is born with  his/her upper lip split. Cleft lip is a congenital deformity of a cleft in the upper lip, on one or both sides of the midline. It occurs when the three blocks of embryonic tissue that go to form the upper lip fail to fuse and it is often associated with a cleft palate. Cleft palate is a congenital fissure along the midline of the roof of the mouth.)

लेकिन न तो जन्म के समय और बाद इसके कॉफ़ी समय तक आत्मविमोही बालक के कोई प्रगट लक्षण होते हैं न डिस्लेक्सिक बालक और न ही ट्रांस-जेंडर के.

बेशक प्रजनन अंगों को देखते ही हम लोग तो लिंग निर्धारण तुरत-फुरत कर डालते हैं नवजात का लेकिन स्वयं उसको इसका इल्म तब होता है जब वह २-३ वर्ष का हो जाता है. ज्यादातर लोगों में मतेक्य और तालमेल रहता है भौत्तिक काया और मनो-भौतिक शरीर में, Perceived gender और assigned sex में. लेकिन ट्रांस-जेंडर में यह तालमेल टूट जाता है साथ ही टूट जाती है जीवन की लय. मनो-भौतिक शरीर अपने असली वजूद के लिए छटपटाने लगता है. एक नई काया ढूंढता है अपने में ही.

माँ बाप भाई बहिन अन्य नाते रिश्ते बौखलाहट छिपा नहीं पाते अपनी. माँ बाप पर तो जैसे वज्रपात ही हो जाता है. एक ठेस लगती है हतप्रभ हो कह उठते हैं- यह कुदरत की कैसी माया है? ज्यादातर माँ बाप इस स्थिति को स्वीकार नहीं पाते. मौन या फिर मुखर अ-स्वीकृति लिए जैसे तैसे दिन गुजारते हैं. इसे एक अपवाद मान आगे नहीं आ पाते इलाज़ के लिए. क्रोध और उन्माद विवेक हीनता अपना खेल खेलने लगती है. एक भ्रम की स्थिति बनी रहती है.

क्या करे निकटतर समाज वृहत्तर समाज ऐसे मामलों में ?

तदानुभूति दिखलाए या मज़ाक उडाये हास्य व्यंग्य विनोद और उपहास का विषय बनाए असर ग्रस्त व्यक्ति को जो खुद एक दुविधा झेल रहा है अपने असल व्यक्तित्व की तलाश में भटक रहा है अपने ही अन्दर अपने आप को तलाश रहा है?

Transman Thomas Beatie
यहाँ माँ बाप और उनकी ट्रांस-जेंडर संतान दोनों सहानुभूति से आगे निकल के तदानुभूति के हकदार होने चाहिए समाज के लिए. यह कोई सामाजिक अभिशाप नहीं बनना चाहिए. सोचना होगा हमें -दोनों ही असाधारण परिस्थितियों के मारे हैं.

ये मामला पाप पुण्य का नहीं है जन्म पूर्व कोशिका के स्तर पर पैदा हुई चूक का है गडबडी का है. कल को जन्म पूर्व इसका समाधान भी निकल सकता है शिनाख्त भी हो सकती है गर्भ में ही गर्भस्थ ट्रांस-जेंडर की.

यहाँ पर मनो-वैज्ञानिक सलाह मशिवरा काउंसलिंग की बराबर दोनों पक्षों को माँ बाप और ट्रांस जेंडर संतानों को निरंतर और दीर्घावधि ज़रुरत है. बच्चों  को अपनी संपत्ति मानकर इन मामलों में ज़बरजस्ती नहीं की जा सकती. आनर किलिंग वाले हमारे समाज को ज्यादा खबरदार और जानकारी की ज़रुरत है जहां ब्याह शादी ही नहीं केरीयर भी माँ बाप ही अरेंज करतें हैं. जेंडर भी. जबकि  ये मामला है जेंडर बेन-डर (GENDER BENDER) का.

सभी पक्षों को विवेक से काम लेने की ज़रुरत है समाज परिवार ट्रांस-जेंडर व्यति और चिकित्सा समाज. सभी को संवेदनशील भी होना पडेगा परस्पर..

 
अस्वीकरण: यहाँ प्रकाशित सभी लेख उनके लेखकों के व्यक्तिगत मत हैं। मात्र वैज्ञानिक सोच/चेतना प्रसार के किए इसका संचालन किया जा रहा है। सभी विवादों का न्याय क्षेत्र लखनऊ रहेगा।